आ चल चल के कही दूर चले
मन रीता है मजबूर चले
ये सकल पथ सब घूम चले
आ चल चल के कही दूर चले......
ये शक्त शिराएँ व्याकुल है
व्यथित है ह्रदय के बंधन
इन भाव विभोर नयनो में
नैसर्गिकता के है ये छंदन
ये दूर भागते पथ आँगन
दल नभ नयनो में घूर चले
आ चल चल के कही दूर चले ......
तप रे मन सजल-स्वर्ण से पावन
मूर्तिमान सपनों में रे ले चल मन
ढल रे, ढल आतुर मन
मन पंडित जाने ना जाने मन
अतिशय सुख के दस्तूर चले
आ चल चल के कही दूर चले ........
.......गुरु कवि हकीम........
Tuesday, November 25, 2008
Tuesday, October 28, 2008
प्राणों से
बढ़कर प्रीत हुई
सोई साँसे संगीत हुई
मन ठहर गया
हिहर गया
सपनों सी मेरी जीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
ठहर ठहर मैं इतराता
समय पकड़ कर कर झुठलाता
जग दोष मेरा बेमोल हुआ
शब्दों में वो अनमोल हुआ
सपने जागे
मेरा मन भागे
रोती साँसे भी गीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
जीवन की धारा हसरत थी
रुकने की कीसको फुरसत थी
मुट्ठी भर सपने पाने कों
चुटकी भर जीवन जीने कों
अलसाई इन पलकों में
उलटी धारा भी रीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा
किरणों में अंकीत सी रेखा
पथ परिचित में आगे बढ़ता
तारो के बादल में चढ़ता
मन आलोक गगन कों छूकर
अभिलाषा के अंत के ऊपर
पल-भर परिचित मनमीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
बढ़कर प्रीत हुई
सोई साँसे संगीत हुई
मन ठहर गया
हिहर गया
सपनों सी मेरी जीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
ठहर ठहर मैं इतराता
समय पकड़ कर कर झुठलाता
जग दोष मेरा बेमोल हुआ
शब्दों में वो अनमोल हुआ
सपने जागे
मेरा मन भागे
रोती साँसे भी गीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
जीवन की धारा हसरत थी
रुकने की कीसको फुरसत थी
मुट्ठी भर सपने पाने कों
चुटकी भर जीवन जीने कों
अलसाई इन पलकों में
उलटी धारा भी रीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा
किरणों में अंकीत सी रेखा
पथ परिचित में आगे बढ़ता
तारो के बादल में चढ़ता
मन आलोक गगन कों छूकर
अभिलाषा के अंत के ऊपर
पल-भर परिचित मनमीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
हम ख्वाब देखते दर्पण में........
हम ख्वाब देखते दर्पण में
ख्वाबो के पूर्जे जोड़ रहे
एक बूँद जहर सा प्याले में
शीशे में दर्पण तोड़ रहे
यहाँ लहू में लथ पथ सीने है
जानिब थक बैठे पीने है
पीते पीते इन शीशो में
हम अक्श तुम्हारा छोड़ रहे ......
गम जब्ज किया है फूलो सा
नश्तर चुभता एक शूलो सा
एक सफ़र ताब जिंदगानी कों
दश्ते उल्फत में मोड़ रहे .....
हर अश्क में खुशीयाँ रोती है
आँखों में हसरत सोती है
ये जुर्म-ए-मौहब्बत है साकी
टूटा इकरार रहा बाकी
खाली हर्फो के पन्नो पर
रीते शब्दों कों जोड़ रहे ...... ........गुरु कवि हकीम
ख्वाबो के पूर्जे जोड़ रहे
एक बूँद जहर सा प्याले में
शीशे में दर्पण तोड़ रहे
यहाँ लहू में लथ पथ सीने है
जानिब थक बैठे पीने है
पीते पीते इन शीशो में
हम अक्श तुम्हारा छोड़ रहे ......
गम जब्ज किया है फूलो सा
नश्तर चुभता एक शूलो सा
एक सफ़र ताब जिंदगानी कों
दश्ते उल्फत में मोड़ रहे .....
हर अश्क में खुशीयाँ रोती है
आँखों में हसरत सोती है
ये जुर्म-ए-मौहब्बत है साकी
टूटा इकरार रहा बाकी
खाली हर्फो के पन्नो पर
रीते शब्दों कों जोड़ रहे ...... ........गुरु कवि हकीम
Saturday, October 25, 2008
भंगुर है संसार
दर्रों के इन क़दमों में
भंगुर है संसार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार
लज्जारुण चेहरा
ये शहर नख़्लिस्तान
बनजारों देश में
नहीं होता कब्रिस्तान
दफ़न सब रश्मे यहाँ
भूखे भेड़िए सा प्यार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार
सौदा-ए-मुहब्बत की
बातो के सहारे
रोते सर पकड़ के
दुखो के सब मारे
धोखा इनकी फितरत
फरेब इनकी यारी
नकली से है चहरे
लोमड की होशयारी
तेरी इस दुनिया में
इनकी ही भरमार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार
चार दिन बसेरा
और बाते लम्बी चोडी
इन्सां के आँगन में
खुशिया कितनी थोड़ी
सुबह जागे खुशिया
दोपहर तक है तपती
शाम आते आते
सारी खुशिया थकती
सीने से लगाए तू
काहे ये गुब्बार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार ........गुरु कवि हकीम
भंगुर है संसार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार
लज्जारुण चेहरा
ये शहर नख़्लिस्तान
बनजारों देश में
नहीं होता कब्रिस्तान
दफ़न सब रश्मे यहाँ
भूखे भेड़िए सा प्यार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार
सौदा-ए-मुहब्बत की
बातो के सहारे
रोते सर पकड़ के
दुखो के सब मारे
धोखा इनकी फितरत
फरेब इनकी यारी
नकली से है चहरे
लोमड की होशयारी
तेरी इस दुनिया में
इनकी ही भरमार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार
चार दिन बसेरा
और बाते लम्बी चोडी
इन्सां के आँगन में
खुशिया कितनी थोड़ी
सुबह जागे खुशिया
दोपहर तक है तपती
शाम आते आते
सारी खुशिया थकती
सीने से लगाए तू
काहे ये गुब्बार
तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार ........गुरु कवि हकीम
Wednesday, October 22, 2008
मन डोर............
कण-कण लौ जगी उससे
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
चुपके से पदचाप
जवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....................
गुरु कवि हाकीम.........................
...............
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
चुपके से पदचाप
जवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....
व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....................
गुरु कवि हाकीम.........................
...............
Tuesday, October 21, 2008
अशकारो में जलते है अब
ईमान की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही......
खुशिया लूटती दहशत बढ़ती
हर सोच यहाँ मरकज चढ़ती
नफ़रत ने मोहब्बत को घूरा
शैतान की नियत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही .......
तम्हीद-ए-सितम तासीर यहाँ
ख़ुद ही होश गवा बैठे
होश-ए-ख़िल्वत हुई रुखसत
नजर-ऐ-सय्याद जवां बैठे
सौदाइयो की बस्ती में
सामान की कीमत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........
रहबर छूटते दामन बटते
ख़ुदनिगरी की अंगड़ाई है
मुश्किल आलम रूश्वाई का
झुर्मुट की ये गहराई है
सरमायो का ये मन्दिर है
बैठी सूरत एक भोली सी
सरमायो के इस मन्दिर में
भावान की सूरत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही..........
एकाकीपन में जीते है
कशिश-ओ-जज़्ब की बात कहा
मायूसी की इस नगरी में
ख़ामोश फ़ज़ाओं सी रात यहाँ
तासीर तसव्वुर चूर हुए
टकरा ही हम टूट गए
टूटा मोटी बिखरी माला
जख्म यहाँ नासूर हुए
हर चीज में मिलती सैय्यारी
नेकी की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........
ईमान की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही......
खुशिया लूटती दहशत बढ़ती
हर सोच यहाँ मरकज चढ़ती
नफ़रत ने मोहब्बत को घूरा
शैतान की नियत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही .......
तम्हीद-ए-सितम तासीर यहाँ
ख़ुद ही होश गवा बैठे
होश-ए-ख़िल्वत हुई रुखसत
नजर-ऐ-सय्याद जवां बैठे
सौदाइयो की बस्ती में
सामान की कीमत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........
रहबर छूटते दामन बटते
ख़ुदनिगरी की अंगड़ाई है
मुश्किल आलम रूश्वाई का
झुर्मुट की ये गहराई है
सरमायो का ये मन्दिर है
बैठी सूरत एक भोली सी
सरमायो के इस मन्दिर में
भावान की सूरत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही..........
एकाकीपन में जीते है
कशिश-ओ-जज़्ब की बात कहा
मायूसी की इस नगरी में
ख़ामोश फ़ज़ाओं सी रात यहाँ
तासीर तसव्वुर चूर हुए
टकरा ही हम टूट गए
टूटा मोटी बिखरी माला
जख्म यहाँ नासूर हुए
हर चीज में मिलती सैय्यारी
नेकी की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........
चाँद ज़रा माध्यम नीकले...
जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स-ए-लताफ़त रोती है
वो आयेगा तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
पा जाए मुरादे शायद तू
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले
जब चाँद तेरा माध्यम नीकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
कोई मन के तार झंझोरेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले
वहा हिस्स-ए-लताफ़त रोती है
वो आयेगा तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
पा जाए मुरादे शायद तू
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले
जब चाँद तेरा माध्यम नीकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
कोई मन के तार झंझोरेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले
दो पैसो में इंसान बिके ....
सैय्याद की दौलत बिखरी है
इस दौलत में हर शान बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....
ईमान बिके बे-ईमान बिके
यहाँ देश धर्म की शान बिके
उजले बिकते काले बिकते
मंदीर बिकते मस्जिद बिकते
पुरपेंच जमाने में सारे
रहबर के सब भगवान् बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके .....
धन बल की माया जारी है
बिकती हुई तन से नारी है
अधखिली ज़र्द सी कलियों में
सौदायो की भारमारी है
नीलामघरो के जीनो में
माँ बहनों की यहाँ आन बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....... ......guru kavi kahim......
इस दौलत में हर शान बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....
ईमान बिके बे-ईमान बिके
यहाँ देश धर्म की शान बिके
उजले बिकते काले बिकते
मंदीर बिकते मस्जिद बिकते
पुरपेंच जमाने में सारे
रहबर के सब भगवान् बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके .....
धन बल की माया जारी है
बिकती हुई तन से नारी है
अधखिली ज़र्द सी कलियों में
सौदायो की भारमारी है
नीलामघरो के जीनो में
माँ बहनों की यहाँ आन बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....... ......guru kavi kahim......
तस्व्वुर वफ़ा....
तस्व्वुर वफ़ा एक पशेमान सी
मेरे शब्दों में है वो कहानी बहुत
जि़न्दगानी बादा सागर है जवां
मेरे शब्दों में है वो जवानी बहुत
इन्तेज़ा बेकरारी तवज्ज़ुन बढे
मेरी धड़कन है मैं वो रवानी बहुत
बीक चुके दिल के अरमान कई मोड़ पर
रास्ते की डगर है सुहानी बहुत
ये मोहब्बत के नग्मे मुतिरब से है
दुनिया है इनकी दीवानी बहुत
फकत उम्र अब तो फना हों चुकी
मेरे शब्दों में अब भी जवानी बहुत...
अभी छोड़ ना दिल के नग्मे 'हकीम'
हयात-ऐ-वफ़ा जिंदगानी बहुत
मेरे शब्दों में है वो कहानी बहुत
जि़न्दगानी बादा सागर है जवां
मेरे शब्दों में है वो जवानी बहुत
इन्तेज़ा बेकरारी तवज्ज़ुन बढे
मेरी धड़कन है मैं वो रवानी बहुत
बीक चुके दिल के अरमान कई मोड़ पर
रास्ते की डगर है सुहानी बहुत
ये मोहब्बत के नग्मे मुतिरब से है
दुनिया है इनकी दीवानी बहुत
फकत उम्र अब तो फना हों चुकी
मेरे शब्दों में अब भी जवानी बहुत...
अभी छोड़ ना दिल के नग्मे 'हकीम'
हयात-ऐ-वफ़ा जिंदगानी बहुत
पीना छोड दो ......
दुनिया कहती है कि पीना छोड दो
ये क्यू नहीं कहती की जीना छोड दो
नुमाया जिन्दगी की तल्खिया लिए
जवां सीने में धड़कने जोड दो
मिज़ाज-ए-अजिजि हमें क्या पता
कोई आके मेरे दिल में वो छोड़ दो
भीगी पलको से हम आज रोते रहे
दरगाय-ऐ-मोहब्बत कोई मोड़ दो
सोचता हूँ बसर घर कोई मैं करू
पेश-ऐ-नश्तर जिगर अब कोई तोड़ दो
गिराँबार तेरी नजर का सिला
तसव्वुर में आके शम्मा छोड़ दो
यख़बस्ता उदासी है दिल में "हकीम"
शुआ जीस्त कोई मुझे मोड़ दो ...
ये क्यू नहीं कहती की जीना छोड दो
नुमाया जिन्दगी की तल्खिया लिए
जवां सीने में धड़कने जोड दो
मिज़ाज-ए-अजिजि हमें क्या पता
कोई आके मेरे दिल में वो छोड़ दो
भीगी पलको से हम आज रोते रहे
दरगाय-ऐ-मोहब्बत कोई मोड़ दो
सोचता हूँ बसर घर कोई मैं करू
पेश-ऐ-नश्तर जिगर अब कोई तोड़ दो
गिराँबार तेरी नजर का सिला
तसव्वुर में आके शम्मा छोड़ दो
यख़बस्ता उदासी है दिल में "हकीम"
शुआ जीस्त कोई मुझे मोड़ दो ...
Friday, October 17, 2008
युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये
युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये
फकत हर जख्मो कों चहरे का आईना ना कहो
कहानी मेरी दर्द-ए-मोहब्बत की दास्ताँ ना कहो
कफस की स्याही रोकती है हवा-ए-शौक़ की कुव्वत
महसूस होती जिन्दगी कों खालिस रोशनाई ना कहो
दोस्त के हाथो ने उठा रखी है आज दुश्मन की तलवार
हमने तो गले लगाया है जयचंदों कों उसे गद्दार ना कहो
निगाह-ए-जमाल में हमारे ऐबो कों गिनाओ जमाने भर में
मगर हमारी अक्स-ए-सोज़-ए-दिल के सामने बुरा ना कहो
मिज़ाज-ए-आजिजी ना दे सको तो कोई बात नहीं "हकीम"
इन नकली चेहरों के आइनों में माहौल अह्द-ए- वफ़ा ना कहो ..
फकत हर जख्मो कों चहरे का आईना ना कहो
कहानी मेरी दर्द-ए-मोहब्बत की दास्ताँ ना कहो
कफस की स्याही रोकती है हवा-ए-शौक़ की कुव्वत
महसूस होती जिन्दगी कों खालिस रोशनाई ना कहो
दोस्त के हाथो ने उठा रखी है आज दुश्मन की तलवार
हमने तो गले लगाया है जयचंदों कों उसे गद्दार ना कहो
निगाह-ए-जमाल में हमारे ऐबो कों गिनाओ जमाने भर में
मगर हमारी अक्स-ए-सोज़-ए-दिल के सामने बुरा ना कहो
मिज़ाज-ए-आजिजी ना दे सको तो कोई बात नहीं "हकीम"
इन नकली चेहरों के आइनों में माहौल अह्द-ए- वफ़ा ना कहो ..
छाया: रचानाएं आमंत्रित
छाया: रचानाएं आमंत्रित
जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स-ए-लताफ़त रोती है
वो आयेगा अब तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
मिट जायेगी राते अब काली
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब ना नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
चहू और उजाला फैलेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
बस चाँद ज़रा माध्यम नीकले .....GURU KAVI HAKIM.......
जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स-ए-लताफ़त रोती है
वो आयेगा अब तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
मिट जायेगी राते अब काली
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब ना नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
चहू और उजाला फैलेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
बस चाँद ज़रा माध्यम नीकले .....GURU KAVI HAKIM.......
Thursday, October 16, 2008
कण-कण लौ जगी उससे
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की
मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की
मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
पदचाप जवानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की.................GURU KAVI HAKIM................
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की
मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की
मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
पदचाप जवानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की.................GURU KAVI HAKIM................
Tuesday, October 14, 2008
पथ पेम
पथ प्रेम ये सीध सामान बना ,
छूटे भय-शंसय और खोट नहीं
चित चंचल मन व्याकुल बाते ,
नि:संशय ह्रदय कोई चोट नहीं
जीवन लतिका सुर मधुर मुक्त ,
ये गतिमय स्त्रोत झंझात नहीं
कुछ शेष रहा शैशव यौवन दर्पण,
ये अवशेष चांदनी रात नहीं
अधिराए बदरीया काली क्यू ,
ये मनुजोचित प्रीत सी बात नहीं
हृदय में ये छल क्यों पनपे ,
कहता पल पल सुधि साथ नहीं
तुम नित नित रचना रचती हों ,
यहाँ प्राणों का आघात नहीं
तुम सब कुछ छीन चली पाती ,
हृदय में खुशी की बात नहीं
गुरु कवि हकीम
छूटे भय-शंसय और खोट नहीं
चित चंचल मन व्याकुल बाते ,
नि:संशय ह्रदय कोई चोट नहीं
जीवन लतिका सुर मधुर मुक्त ,
ये गतिमय स्त्रोत झंझात नहीं
कुछ शेष रहा शैशव यौवन दर्पण,
ये अवशेष चांदनी रात नहीं
अधिराए बदरीया काली क्यू ,
ये मनुजोचित प्रीत सी बात नहीं
हृदय में ये छल क्यों पनपे ,
कहता पल पल सुधि साथ नहीं
तुम नित नित रचना रचती हों ,
यहाँ प्राणों का आघात नहीं
तुम सब कुछ छीन चली पाती ,
हृदय में खुशी की बात नहीं
गुरु कवि हकीम
पथ प्रेम सजा तू अब राधा ,
माधव तबहू नाही कातर हिरदे ,प्रेम बढ़त होय विरह आधा ।
अब कै तार तिये सूत नोका , सूनुह प्रात भावः विहल साधा
तोरी रटु बिछिया सी बतीया ,लीये जिए नछत्र सा अनुराधा
इबिही प्रेम पथि तोई विधिना राखो ,जोई चुनर सुई हुई बाधा
अपवश नयन ना चितोर भरउ अबू ,करी सूनी बात सुनो माधा
दियौ अभेद "हकीम" गती दाउँ ,समरथ सुमिरन जो बलि राधा ......
माधव तबहू नाही कातर हिरदे ,प्रेम बढ़त होय विरह आधा ।
अब कै तार तिये सूत नोका , सूनुह प्रात भावः विहल साधा
तोरी रटु बिछिया सी बतीया ,लीये जिए नछत्र सा अनुराधा
इबिही प्रेम पथि तोई विधिना राखो ,जोई चुनर सुई हुई बाधा
अपवश नयन ना चितोर भरउ अबू ,करी सूनी बात सुनो माधा
दियौ अभेद "हकीम" गती दाउँ ,समरथ सुमिरन जो बलि राधा ......
Saturday, October 11, 2008
इज़हार करू तो कैसे करू ...
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
चीस्त मेरा तिहीदस्त रहा
मैं इशक करू तो कैसे करू
एक जहा ढूंडा गरचे हमने
वहा पर भी पर्दा नाशाद्काम
वो सात तहों के भीतर था
मैं आबादस्त था बिना जाम
लबरेज झलकते जामो का
इशआर करू तो कैसे करू ......
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
एक शाम इम्तिदादे कैफ लीये
जामे तरतीब पीये हमने
बादये कुहन के शीशो में
शब -ऐ-पैगाम जिए हमने
हर शाम तुलुअ की तारीकी
तन्हाइयो में रोया करते
बियाबान गुजरते पहलू में
महदूद करू तो कैसे करू
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू ..........guru kavi hakim.....
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
चीस्त मेरा तिहीदस्त रहा
मैं इशक करू तो कैसे करू
एक जहा ढूंडा गरचे हमने
वहा पर भी पर्दा नाशाद्काम
वो सात तहों के भीतर था
मैं आबादस्त था बिना जाम
लबरेज झलकते जामो का
इशआर करू तो कैसे करू ......
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
एक शाम इम्तिदादे कैफ लीये
जामे तरतीब पीये हमने
बादये कुहन के शीशो में
शब -ऐ-पैगाम जिए हमने
हर शाम तुलुअ की तारीकी
तन्हाइयो में रोया करते
बियाबान गुजरते पहलू में
महदूद करू तो कैसे करू
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू ..........guru kavi hakim.....
संसार जगत एक अंध कूप ......
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप
उस पार समंदर पर्वत है
इस पार नदी का खुला रूप
इंसा बटता खुशिया रोती
और भूख में है भाषा सोती
जहा मौत नाचती दौराहे
ले हाथो में पत्थर स्वरुप
संसार जगत एक अंध कूप
संसार जगत एक खिली धूप .....
ये लोक गतानुगति का है
सबकी विस्मृत सहमति का है
अलसित जीवन की धारा पर
यहाँ टूट रहे शिथिल कुरूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप ......
संसार सोच एक दर्पण है
प्राणों के भीतर अर्पण है
करुणा पिसती अंधियारे है
अवसादों के आँगन सारे है
यहाँ रोज़ सुलगती साँसों में
जीवन रचता अनुप्रीत अनूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप .....guru kavi hakim
जहा खिली छिपी रहती है धूप
उस पार समंदर पर्वत है
इस पार नदी का खुला रूप
इंसा बटता खुशिया रोती
और भूख में है भाषा सोती
जहा मौत नाचती दौराहे
ले हाथो में पत्थर स्वरुप
संसार जगत एक अंध कूप
संसार जगत एक खिली धूप .....
ये लोक गतानुगति का है
सबकी विस्मृत सहमति का है
अलसित जीवन की धारा पर
यहाँ टूट रहे शिथिल कुरूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप ......
संसार सोच एक दर्पण है
प्राणों के भीतर अर्पण है
करुणा पिसती अंधियारे है
अवसादों के आँगन सारे है
यहाँ रोज़ सुलगती साँसों में
जीवन रचता अनुप्रीत अनूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप .....guru kavi hakim
Monday, October 6, 2008
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
सोई साँसे संगीत हुई
मन ठहर गया
मन हिहर गया
सपनों सी मेरी जीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
ठहर ठहर मैं इतराता
समय पकड़ कर कर झुठलाता
जग दोष मेरा बेमोल हुआ
शब्दों में वो अनमोल हुआ
सपने जागे
मेरा मन भागे
रोती साँसे भी गीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
जीवन की धारा हसरत थी
रुकने की कीसको फुरसत थी
मुट्ठी भर सपने पाने कों
चुटकी भर जीवन जीने कों
अलसाई इन पलकों में
उलटी धारा भी रीत
हुई प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा
किरणों में अंकीत सी रेखा
पथ परिचित में आगे बढ़ता
तारो के बादल में चढ़ता
मन आलोक गगन कों छूकर
अभिलाषा के अंत के ऊपर
पल-भर परिचित मनमीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
सोई साँसे संगीत हुई
मन ठहर गया
मन हिहर गया
सपनों सी मेरी जीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
ठहर ठहर मैं इतराता
समय पकड़ कर कर झुठलाता
जग दोष मेरा बेमोल हुआ
शब्दों में वो अनमोल हुआ
सपने जागे
मेरा मन भागे
रोती साँसे भी गीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
जीवन की धारा हसरत थी
रुकने की कीसको फुरसत थी
मुट्ठी भर सपने पाने कों
चुटकी भर जीवन जीने कों
अलसाई इन पलकों में
उलटी धारा भी रीत
हुई प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा
किरणों में अंकीत सी रेखा
पथ परिचित में आगे बढ़ता
तारो के बादल में चढ़ता
मन आलोक गगन कों छूकर
अभिलाषा के अंत के ऊपर
पल-भर परिचित मनमीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
Saturday, October 4, 2008
इंसान बिके एक धेले में
मेरा साहब कहे अकेले में
निरमोही जगत झमेले में
आखन देखी झूट लगे
जागत रहियो इस मेले में
समझावत हारा मन मोरा
ये रंग बिरंगी सा डोरा
मैं ढूंदत ढूंदत ढूंड फिरा
मैं बिचल गया इस रेले में
रे सुन "हकीम" बाती तेरी
मैं रोऊ आज अकेले में
निरमोही जगत झमेले में
इंसान बिके एक धेले में
ये चेतन मन जब कहता है
अकलुष सपनों सा बहता है
जब विश्व-वेदना बढ़ती है
निष्ठुर व्यथा तब चढ़ती है
इस विश्व-वेदना के भीतर
अकुलाऊ आज अकेले में
पाप पुन्य जहा गले मीले
और रहते एक ही थेले मैं
मेरा साहब कहे अकेले में
इंसान बिके एक धेले में
निर्मोही जगत झमेले में
निरमोही जगत झमेले में
आखन देखी झूट लगे
जागत रहियो इस मेले में
समझावत हारा मन मोरा
ये रंग बिरंगी सा डोरा
मैं ढूंदत ढूंदत ढूंड फिरा
मैं बिचल गया इस रेले में
रे सुन "हकीम" बाती तेरी
मैं रोऊ आज अकेले में
निरमोही जगत झमेले में
इंसान बिके एक धेले में
ये चेतन मन जब कहता है
अकलुष सपनों सा बहता है
जब विश्व-वेदना बढ़ती है
निष्ठुर व्यथा तब चढ़ती है
इस विश्व-वेदना के भीतर
अकुलाऊ आज अकेले में
पाप पुन्य जहा गले मीले
और रहते एक ही थेले मैं
मेरा साहब कहे अकेले में
इंसान बिके एक धेले में
निर्मोही जगत झमेले में
तेरे प्यार मैं........
मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में ,
सपने पुलकित हरीतिमा ,
तेरे प्यार में
पथ पथ पे बिखरा
सुनहरा सा रूप ,
मधु मरन्द भर कर
खिली जैसी धूप .
सिर्फ एक शब्द है ,
विरहाकुल सी हद है .
विषय वश हुआ मैं ,
अधर चूम कर ,
कुमुद दल पे भंवरे
सकल घूम कर ,
मन के सीते है धाँगे
तेरे प्यार में
मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में .......
ये द्रवित प्राणों का
भय अब नहीं
ह्रदय के भीतर
भ्रम अब नहीं
साँसे बिखरी थी
जो मेरे कल
आलिंगन करती है
वो पल पल,
छूकर जीवन की
मुरली की धुन
सजल- स्वर्ण
सपने बुने प्रतिपल,
मैं रीते ह्रदय का
बनू मुक्त बंधन
तेरे प्यार में .....
मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में ......... Guru Kavi Hakim.......
तेरे प्यार में ,
सपने पुलकित हरीतिमा ,
तेरे प्यार में
पथ पथ पे बिखरा
सुनहरा सा रूप ,
मधु मरन्द भर कर
खिली जैसी धूप .
सिर्फ एक शब्द है ,
विरहाकुल सी हद है .
विषय वश हुआ मैं ,
अधर चूम कर ,
कुमुद दल पे भंवरे
सकल घूम कर ,
मन के सीते है धाँगे
तेरे प्यार में
मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में .......
ये द्रवित प्राणों का
भय अब नहीं
ह्रदय के भीतर
भ्रम अब नहीं
साँसे बिखरी थी
जो मेरे कल
आलिंगन करती है
वो पल पल,
छूकर जीवन की
मुरली की धुन
सजल- स्वर्ण
सपने बुने प्रतिपल,
मैं रीते ह्रदय का
बनू मुक्त बंधन
तेरे प्यार में .....
मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में ......... Guru Kavi Hakim.......
Saturday, September 13, 2008
प्रबल वेग की धारा सा
मन संताप बढ़ा मन में
मानवता के इस क्रंदन पर
शापित आक्रोश जगा जन में
काली अंधियारी रातो का द्वेष
उर उजियारे में फैलाता क्लेश
नफ़रत का ये घौर अँधेरा
ना तेरा है ना ही मेरा
कब जागे बुद्धा की बाते
ह्रदय बीच उनके कण कण में ......
मौत बाटते काले बादल
मृत्यु नाच आँगन में वसुधा के करते
पावन अमृत में अनीति का विषपान है भरते
फूँक रहे पेडो की धरती
आग बुझेगी कब ये वन में .......
कौन बचेगा ज्वाल लहर से
कौन जियेगा व्यथा जहर से
जिन पत्तो से आँगन रचते
कौन बिंधेगा रूद्र कहर से
व्याकुल हूँ इस छल पीडा से
व्याकुल हूँ इस मिथ्या से
उमड़-उमड़ कर सपने छलते
स्पन्दन करते उन्मन में.......
----------कवि हकीम ------------
मन संताप बढ़ा मन में
मानवता के इस क्रंदन पर
शापित आक्रोश जगा जन में
काली अंधियारी रातो का द्वेष
उर उजियारे में फैलाता क्लेश
नफ़रत का ये घौर अँधेरा
ना तेरा है ना ही मेरा
कब जागे बुद्धा की बाते
ह्रदय बीच उनके कण कण में ......
मौत बाटते काले बादल
मृत्यु नाच आँगन में वसुधा के करते
पावन अमृत में अनीति का विषपान है भरते
फूँक रहे पेडो की धरती
आग बुझेगी कब ये वन में .......
कौन बचेगा ज्वाल लहर से
कौन जियेगा व्यथा जहर से
जिन पत्तो से आँगन रचते
कौन बिंधेगा रूद्र कहर से
व्याकुल हूँ इस छल पीडा से
व्याकुल हूँ इस मिथ्या से
उमड़-उमड़ कर सपने छलते
स्पन्दन करते उन्मन में.......
----------कवि हकीम ------------
Friday, September 12, 2008
इस उजले पथियारे पथ से
बीच धरा के मृदुल रथ से
मुझे जन्म दो माँ
बाट सकू पथ पीडा मन की
विद्युत-छबि उर नवजीवन की
तिमिर भेद प्रकाश उबेरू
उन्मन पुष्प गति बखेरू
ज्योति ज्योति नव प्राण खीच कर
हर जीवन में अमृत सींच कर
नभ हाथो से तारे छुलू
मुझे जन्म दो माँ
रोक सकू अंधियारा सब का
बाँध सकू उर उजियारा सब का
नहीं त्रास नहीं प्यास बचे अब
क्षुब्ध, लुब्ध तूफ़ान सजे अब
रचो रक्ष शुक्ति मरूपथ से
अंत ना हों दुर्लभ परिपथ से
मुझे जन्म दो माँ
जन्म दो माँ
बीच धरा के मृदुल रथ से
मुझे जन्म दो माँ
बाट सकू पथ पीडा मन की
विद्युत-छबि उर नवजीवन की
तिमिर भेद प्रकाश उबेरू
उन्मन पुष्प गति बखेरू
ज्योति ज्योति नव प्राण खीच कर
हर जीवन में अमृत सींच कर
नभ हाथो से तारे छुलू
मुझे जन्म दो माँ
रोक सकू अंधियारा सब का
बाँध सकू उर उजियारा सब का
नहीं त्रास नहीं प्यास बचे अब
क्षुब्ध, लुब्ध तूफ़ान सजे अब
रचो रक्ष शुक्ति मरूपथ से
अंत ना हों दुर्लभ परिपथ से
मुझे जन्म दो माँ
जन्म दो माँ
Monday, September 8, 2008
नुकताची बढ़ती गई, दिल के तारे ना जले
अब जमाने में भला ,खुद-ब-खुद कर्ब चले
कमरी रातो का समा ,दिल का दस्तगीर बने
फिर वो मावस की सबा, नग्जे हरबार खिले
मैं फकत ताइब तेरा ,जाब्ते गम मैंने कीये
बुगज बढाता ही गया ,ना मिटे दिल के सिले
ये अजीयत सा शमा, तजल्जुल करता सहर
गमख्वारी ना मिली , फिर होके ग़मगीन चले ...
कर्ब = व्याकुलता /पीडा
कमरी = चांदनी
दस्तगीर = मददगार
मावस = काली अंधेरी रात
सबा = वक्त
नग्जे = अदभुत हालत
ताइब = बुरी आदत पर अलग रहने की प्रतिग्या करने वाला
जाब्ते गम = दुखो उजागर ना करने वाला
बुगज = मन में रखे जाने वाला बैर
अजीयत = यातना ,दुःख
तजल्जुल = कम्पन
सहर= सवेरा
गमख्वारी= सहायता
ग़मगीन= दुखो से व्याकुल
.............हकीम साहिब .......
अब जमाने में भला ,खुद-ब-खुद कर्ब चले
कमरी रातो का समा ,दिल का दस्तगीर बने
फिर वो मावस की सबा, नग्जे हरबार खिले
मैं फकत ताइब तेरा ,जाब्ते गम मैंने कीये
बुगज बढाता ही गया ,ना मिटे दिल के सिले
ये अजीयत सा शमा, तजल्जुल करता सहर
गमख्वारी ना मिली , फिर होके ग़मगीन चले ...
कर्ब = व्याकुलता /पीडा
कमरी = चांदनी
दस्तगीर = मददगार
मावस = काली अंधेरी रात
सबा = वक्त
नग्जे = अदभुत हालत
ताइब = बुरी आदत पर अलग रहने की प्रतिग्या करने वाला
जाब्ते गम = दुखो उजागर ना करने वाला
बुगज = मन में रखे जाने वाला बैर
अजीयत = यातना ,दुःख
तजल्जुल = कम्पन
सहर= सवेरा
गमख्वारी= सहायता
ग़मगीन= दुखो से व्याकुल
.............हकीम साहिब .......
Wednesday, September 3, 2008
शब्द
यहाँ व्याकुल से
शब्द खड़े है
परिधानों में
शब्द जड़े है
मेरे इन शब्दों में
तुम हों
मेरी इन आँखों में
तुम हों
जीन शब्दों से
साँसे पिघले
मेरी उन साँसों में
तुम हों
अपने शब्द ,
मै गाऊ कैसे
तार है टुटे
मन के ऐसे
एक नही दस
ओर खडे है
कीसको मारु
पास बढे है
गलत बने सब
गोरख धन्दे
गान्ठ के पुरे
आन्ख के अन्धे
यहा ........
बढता ही जाये सन्ग्राम .........
कसम से हम....
रह जाते है दिल थाम ..
शब्द खड़े है
परिधानों में
शब्द जड़े है
मेरे इन शब्दों में
तुम हों
मेरी इन आँखों में
तुम हों
जीन शब्दों से
साँसे पिघले
मेरी उन साँसों में
तुम हों
अपने शब्द ,
मै गाऊ कैसे
तार है टुटे
मन के ऐसे
एक नही दस
ओर खडे है
कीसको मारु
पास बढे है
गलत बने सब
गोरख धन्दे
गान्ठ के पुरे
आन्ख के अन्धे
यहा ........
बढता ही जाये सन्ग्राम .........
कसम से हम....
रह जाते है दिल थाम ..
Tuesday, September 2, 2008
ये मंजर ....
ये मंजर दिल जलाता है इन्तेबा है बहुत बाकी
अभी से हाल बर्गे -ऐ- दिल, अभी मंजिल बहुत बाकी ॥
बताते हों जो हिचकियों से हमारा राज राह दहरे
सितम सीने में गाफिल है ,अभी बाते बहुत बाकी
तवक्को तुम नहीं करते , शिकायत आज सारी है
स्याह रातो से तुम डरते , अभी राते बहुत बाकी
सब-ऐ-गम की ये शायारी परेशाँ आज हम भी है
रहो परदों में तुम हज़रत ,हजाते है बहुत बाकी
नही फिकरे गम -ऐ--मंजिल मैं डरता हूँ हिकारत से
वस्ल रख अब हयाते तुम , तिजारत अब नही बाकी ....
ये मंजर दिल जलाता है इन्तेबा है बहुत बाकी
अभी से हाल बर्गे -ऐ- दिल, अभी मंजिल बहुत बाकी ॥
बताते हों जो हिचकियों से हमारा राज राह दहरे
सितम सीने में गाफिल है ,अभी बाते बहुत बाकी
तवक्को तुम नहीं करते , शिकायत आज सारी है
स्याह रातो से तुम डरते , अभी राते बहुत बाकी
सब-ऐ-गम की ये शायारी परेशाँ आज हम भी है
रहो परदों में तुम हज़रत ,हजाते है बहुत बाकी
नही फिकरे गम -ऐ--मंजिल मैं डरता हूँ हिकारत से
वस्ल रख अब हयाते तुम , तिजारत अब नही बाकी ....
Monday, September 1, 2008
अनुनय ह्रदय की मौन हवा
जीवन पथ के निर्ज़न वन में
ज्योत्स्ना का प्राण बिंदु है
जहा देह के देवता
सतत ह्रदय कों अभिलाषा के
पयोनिधिस्वरुप कों विप्लव के साथ
मनस्ताप के
बहुत भीतर तक खोजते रहते है
और हम
क्षुब्ध शब्दों के पास
बैठकर बाते करते है
प्रागंण में सुनतीवो अनजान अनुभूति
हमारी नियमन बातो कों
कान के उस छौर में
संजोह लेती है
और स्वम प्रतिपल सी
ओझल हों जाती है
हमारी स्फुलिग द्रष्टी के सामने से
शब्दों का बहाव
अपने आप में
उस विभिश्ना का प्रतिरूप है
जो हमारे ह्रदय के
अन्त्स्वरूप स्रोतों से
फूटकर बहार आता है
गतिमय प्रवाह और
परवशता की भांती
मैं अकेला बैठा
उस निर्जन चट्टान का
स्वरुप बनने लगता हूँ
जो समय और काल के हाथो
चेतना के
उन क्षण कों जोड़कर
अपने आप कों
खडा कर पाती है
उस जमीं पर
जहा उसका स्वरुप
अपने आस्तित्व कों
निर्मित करता है ......
जीवन पथ के निर्ज़न वन में
ज्योत्स्ना का प्राण बिंदु है
जहा देह के देवता
सतत ह्रदय कों अभिलाषा के
पयोनिधिस्वरुप कों विप्लव के साथ
मनस्ताप के
बहुत भीतर तक खोजते रहते है
और हम
क्षुब्ध शब्दों के पास
बैठकर बाते करते है
प्रागंण में सुनतीवो अनजान अनुभूति
हमारी नियमन बातो कों
कान के उस छौर में
संजोह लेती है
और स्वम प्रतिपल सी
ओझल हों जाती है
हमारी स्फुलिग द्रष्टी के सामने से
शब्दों का बहाव
अपने आप में
उस विभिश्ना का प्रतिरूप है
जो हमारे ह्रदय के
अन्त्स्वरूप स्रोतों से
फूटकर बहार आता है
गतिमय प्रवाह और
परवशता की भांती
मैं अकेला बैठा
उस निर्जन चट्टान का
स्वरुप बनने लगता हूँ
जो समय और काल के हाथो
चेतना के
उन क्षण कों जोड़कर
अपने आप कों
खडा कर पाती है
उस जमीं पर
जहा उसका स्वरुप
अपने आस्तित्व कों
निर्मित करता है ......
Sunday, August 31, 2008
इशक मासूम...
जीस्त नासूर-ऐ-गुल-ऐ-बां में जिगर सोता है
पाक दामन के गिरेबां में वस्ल होता है
शर्म दामन में फना बंदगी सा रोता है
इशक मासूम जवानी में फ़ना होता है
वस्ल मासूम कहे मुझसे सदा
जिन्दगी तेरी .... बंदगी मेरी......................गुरु कवि हकीम...
Friday, August 29, 2008
सूरज निकला आँखे मलते ..
सूरज निकला आँखे मलते
अंधियारे से चलते चलते
राह देख रही है सुबह
मन तृष्णा में जलते जलते
स्वपनिल आशा किरण पसेरी
सींचे मन में सब उजयेरी
हर्षित मन जब पाव पसारे
धूप चखु अपने हीस्से की
अंधियारा मन ढलते ढलते ....
आँखे भीगी मन मुस्काये
हँसते हँसते पलके गाये
समझ ना पाऊ जब भाषा में
खामौशी मुझे राह दिखाए
दूर छितिज पर हंसते तारे
ह्रदय वास पर जलते जलते .......
अंधियारे से चलते चलते
राह देख रही है सुबह
मन तृष्णा में जलते जलते
स्वपनिल आशा किरण पसेरी
सींचे मन में सब उजयेरी
हर्षित मन जब पाव पसारे
धूप चखु अपने हीस्से की
अंधियारा मन ढलते ढलते ....
आँखे भीगी मन मुस्काये
हँसते हँसते पलके गाये
समझ ना पाऊ जब भाषा में
खामौशी मुझे राह दिखाए
दूर छितिज पर हंसते तारे
ह्रदय वास पर जलते जलते .......
किसी का साथ नीगाहों में बस गया जब भी
दराज हों के पनाहों में बस गया जब भी
हज़ार झोके उलझते है मुख्तसर बन के
बहार हों के हवाओं में बस गया जब भी
क्यू हमसे पूछे जमाने में रहगुजर तेरी
एजाज़ हों के ज़माने में बस गया जब भी
आमादा हूँ अब सफ़र सुकूँ-ए-राहो में
पयामे हुशन सजाने में बस गया जब भी
कही चिराग से खैरामे जख्म जलता है
हुस्न-ओ-इश्क़ मनाने में बस गया भी
"हकीम" नश्तर निगाह -ए- इश्क आज चुभे
आशना हों के तरानो में बस गया जब भी
दराज हों के पनाहों में बस गया जब भी
हज़ार झोके उलझते है मुख्तसर बन के
बहार हों के हवाओं में बस गया जब भी
क्यू हमसे पूछे जमाने में रहगुजर तेरी
एजाज़ हों के ज़माने में बस गया जब भी
आमादा हूँ अब सफ़र सुकूँ-ए-राहो में
पयामे हुशन सजाने में बस गया जब भी
कही चिराग से खैरामे जख्म जलता है
हुस्न-ओ-इश्क़ मनाने में बस गया भी
"हकीम" नश्तर निगाह -ए- इश्क आज चुभे
आशना हों के तरानो में बस गया जब भी
Thursday, August 28, 2008
मैं यूही शौक से हार जाता हूँ बाजी तुझसे ॥
ताकी तुम हँसते रहो मेरे प्यार की खातिर ॥
मैं कजा कों भी हरा दुंगा अपनी हसरत से
ताकी तुम जिंदा रहो मेरे प्यार की खातिर
इश्क जाहीली में पशेमान है ये जुलो सितम
ताकी शर्मिन्दा ना हों मेरे प्यार की खातिर
कितनी फुरसत से जोड़ी ये तकसीम-ऐ-शाई
फासले दरमयां ना हों मेरे प्यार की खातिर
ऐ ग़म-ए-दुनिया तेरे गम का तस्व्वुर हूँ मैं
तू गमजदा ना रहो मेरे प्यार की खातिर
होठ ताकीद है और बेच दी गैरत "हकीम"
ताकी बंदगानी ना हों मेरे प्यार की खातिर ......
ताकी तुम हँसते रहो मेरे प्यार की खातिर ॥
मैं कजा कों भी हरा दुंगा अपनी हसरत से
ताकी तुम जिंदा रहो मेरे प्यार की खातिर
इश्क जाहीली में पशेमान है ये जुलो सितम
ताकी शर्मिन्दा ना हों मेरे प्यार की खातिर
कितनी फुरसत से जोड़ी ये तकसीम-ऐ-शाई
फासले दरमयां ना हों मेरे प्यार की खातिर
ऐ ग़म-ए-दुनिया तेरे गम का तस्व्वुर हूँ मैं
तू गमजदा ना रहो मेरे प्यार की खातिर
होठ ताकीद है और बेच दी गैरत "हकीम"
ताकी बंदगानी ना हों मेरे प्यार की खातिर ......
Wednesday, August 27, 2008
क़रार दिल में आये
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये
मस्ती नज्म सी हस्ती
मुतिरब सा दिल गाये
मैं वाल्ले वाल्ले चालू
क़रार दिल में आये ....
ऐ ग़म-ए-दुनिया किलवत
चश्म-ओ-आरिज़ सी तिबयत
तस्व्वुर मन के सारे
यु दिल में गुदगुदाए
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये .....
शाने शिकवा किसका
जि़न्दगानी बादा जिसका
मुनहमिक मन तेरा
तुर्बत में मुस्कराए
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये ....
सदाकत इश्क -ऐ-नजरे
ख्वाब-ऐ-हकीकत सजरे
जशनो वादा ये फरदा
अहसासी गुल खिलाये
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये .....
मसकन के पीछे हम भी
अहद-ए-जुबां सा गम भी
"हकीम" गीत कायल
ऐतबार मन में आये
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये ..
क़रार दिल में आये
मस्ती नज्म सी हस्ती
मुतिरब सा दिल गाये
मैं वाल्ले वाल्ले चालू
क़रार दिल में आये ....
ऐ ग़म-ए-दुनिया किलवत
चश्म-ओ-आरिज़ सी तिबयत
तस्व्वुर मन के सारे
यु दिल में गुदगुदाए
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये .....
शाने शिकवा किसका
जि़न्दगानी बादा जिसका
मुनहमिक मन तेरा
तुर्बत में मुस्कराए
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये ....
सदाकत इश्क -ऐ-नजरे
ख्वाब-ऐ-हकीकत सजरे
जशनो वादा ये फरदा
अहसासी गुल खिलाये
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये .....
मसकन के पीछे हम भी
अहद-ए-जुबां सा गम भी
"हकीम" गीत कायल
ऐतबार मन में आये
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये ..
Tuesday, August 26, 2008
हम अकेले ही चले
हम अकेले ही चले....
हम अकेले ही चले
चार दिन के थे सिले
हम अकेले ही चले
दिल ये इब्दाद हुआ
इश्क बर्बाद हुआ
बंद कलियों में यहाँ
फूल देखो है खीले ,,,.............हम अकेले ही चले
प्यार तोहमत था बना
जुल्म था धुल सना
हम तो कांटो में चले
करम थे उनके भले ...............हम अकेले ही चले
सांस रोती ही रही
आस सोती ही रही
शूल यु दिल चुभे
जब वो हंसते से मिले...........हम अकेले ही चले
थक चुका लंबा सफ़र
आंसू जज्बो का हसर
हम तमाशा क्यू बने
उनके ये शिकवे गिले ..........हम अकेले ही चले
हर्फो का ये है बयाँ
खून की थी वो हया
लहू आँखों में मगर
होठ ना तब भी हिले.............हम अकेले ही चले
जज्बा यु सारा जकड
होसला अपना पकड़
बढ़ते मकसूदे कदम
जा के मंजील से मिले.............हम अकेले ही चले
चार दिन के थे सिले
हम अकेले ही चले
दिल ये इब्दाद हुआ
इश्क बर्बाद हुआ
बंद कलियों में यहाँ
फूल देखो है खीले ,,,.............हम अकेले ही चले
प्यार तोहमत था बना
जुल्म था धुल सना
हम तो कांटो में चले
करम थे उनके भले ...............हम अकेले ही चले
सांस रोती ही रही
आस सोती ही रही
शूल यु दिल चुभे
जब वो हंसते से मिले...........हम अकेले ही चले
थक चुका लंबा सफ़र
आंसू जज्बो का हसर
हम तमाशा क्यू बने
उनके ये शिकवे गिले ..........हम अकेले ही चले
हर्फो का ये है बयाँ
खून की थी वो हया
लहू आँखों में मगर
होठ ना तब भी हिले.............हम अकेले ही चले
जज्बा यु सारा जकड
होसला अपना पकड़
बढ़ते मकसूदे कदम
जा के मंजील से मिले.............हम अकेले ही चले
Monday, August 25, 2008
घर आवे साजन
हाथिये चढ़ल आयो साजन
साखी री मन मौर सा नाचे
माई री मन मोरो यु अकुलावे
आँखों के कोनो में सपने सजावे
घोड़बे चढ़ल घर आवे
साखी री मन मौर सा नाचे ....
श्याम संगे जब सन्नर महके
मुतियन आंसू जानैत दहके
कथिये चढ़ल घर चहके
साखी री मन मौर सा नाचे
लाख जन्म का सखी मोरो साजन
अन्देशबा लागि जारि मिझा आजन
मोटरवा चढ़ल घर बाजन
साखी री मन मौर सा नाचे
आज अंगनवा "गुरु" पडी चरणा
कोने नगरिया छोड़बा धरणा
जेही पैदल चलब घर आवे
साखी री मन मौर सा नाचे ......
साखी री मन मौर सा नाचे
माई री मन मोरो यु अकुलावे
आँखों के कोनो में सपने सजावे
घोड़बे चढ़ल घर आवे
साखी री मन मौर सा नाचे ....
श्याम संगे जब सन्नर महके
मुतियन आंसू जानैत दहके
कथिये चढ़ल घर चहके
साखी री मन मौर सा नाचे
लाख जन्म का सखी मोरो साजन
अन्देशबा लागि जारि मिझा आजन
मोटरवा चढ़ल घर बाजन
साखी री मन मौर सा नाचे
आज अंगनवा "गुरु" पडी चरणा
कोने नगरिया छोड़बा धरणा
जेही पैदल चलब घर आवे
साखी री मन मौर सा नाचे ......
गुरुवा आ गया रे मेरे लाल
गुरुवा आ गयो रे मेरे लाल ..
आ गयो रे मरे लाल , दिल पे छा गयो रे मेरे लाल ..
दीपक बन उजियारा लाया, बना मृदुल मोम सा ढाल
निर्जन मन तारे पुन नवरंग,सए पूछय सैसव काल
दीप-बाति आपुन संगम, जजमान सा रूप विकाल
संग बती मोहे चांदी जडिया ,भरी भरी सुख तै ताल
कहे "गुरु" जग बाती मोरी , पर ब्रह्म दीया मेरे लाल ............
आ गयो रे मरे लाल , दिल पे छा गयो रे मेरे लाल ..
दीपक बन उजियारा लाया, बना मृदुल मोम सा ढाल
निर्जन मन तारे पुन नवरंग,सए पूछय सैसव काल
दीप-बाति आपुन संगम, जजमान सा रूप विकाल
संग बती मोहे चांदी जडिया ,भरी भरी सुख तै ताल
कहे "गुरु" जग बाती मोरी , पर ब्रह्म दीया मेरे लाल ............
Sunday, August 24, 2008
ऐ प्यार तू मेरे सुधर भी जा
ना भोले पन में मुझको फंसा
ना मैं तेरी ना तू मेरा
इस तरह से मेरा दिल ना जला...
ऐ यार तू मेरे सुधर भी जा
तू है भोला
और मतवाला
तेरी आँखे गोल
मैं डावा दोल
एक बार तों कर तू
मुझसे प्यार
फिर दुनीया में तू
किधर भी जा ............ए प्यार तू मेरे सुधर भी जा
तेरा मन सुन्दर
तेरा दिल सुन्दर
सुन्दरता का तू रखवाला
तू राग बंसंती बना फिरे
मैं हू तेरी मधुशाला
पी प्याले को इस
तरह से तू
कही इसकी खुशबु
बिखर ना जा ........ऐ प्यार तू मेरे सुधर भी जा
ना भोले पन में मुझको फंसा
ना मैं तेरी ना तू मेरा
इस तरह से मेरा दिल ना जला...
ऐ यार तू मेरे सुधर भी जा
तू है भोला
और मतवाला
तेरी आँखे गोल
मैं डावा दोल
एक बार तों कर तू
मुझसे प्यार
फिर दुनीया में तू
किधर भी जा ............ए प्यार तू मेरे सुधर भी जा
तेरा मन सुन्दर
तेरा दिल सुन्दर
सुन्दरता का तू रखवाला
तू राग बंसंती बना फिरे
मैं हू तेरी मधुशाला
पी प्याले को इस
तरह से तू
कही इसकी खुशबु
बिखर ना जा ........ऐ प्यार तू मेरे सुधर भी जा
कभी गलियों में उनकी जाना हों कहीये उनसे की बेवफा......
एक " हकीम" दिल-ए-मुज़तरिब से राह तकता है तुम्हारी ....
ये तुम्हारी प्यार की बाते मिज़्ह्ग़ाँ जिस के ग़म में पशेमा हों आप
वही आफ़त-ए-दिल-ए-हकीम किसी रोज़ हम भी कहते थे किसी से....
अक्सर मेरे साथ तू रहती है तो तन्हाई क्यू रहती है i
ना जाने कहा ये निगाह-ए-आईना-साज़ में छुपी रहती है
मिया हम शेर है औए शेरो की गुर्राहट नहीं जाती
निगाहें भर भी उठी तो खाकसार हों जाती है ज़मी॥
ना होठ खिलते है अब ना तब्बसुम है किसी आँख का
शबनम से आंसू है मेरे और खैल दर्दमंदी है ये रात का ...
मेरी रहगुजर में तू ऐसे मिसाले-शरार ना देख ..
जल जायेगा "हकीम" निरे तिनको का बना है ये ..........
अजीयत-ऐ-जहा की अजार सी जमीं का रहनशी दयार है तू ..
चिरागों कों जलाए रखना अंधेरो में कम ही नजर आता हूँ मैं...
एक " हकीम" दिल-ए-मुज़तरिब से राह तकता है तुम्हारी ....
ये तुम्हारी प्यार की बाते मिज़्ह्ग़ाँ जिस के ग़म में पशेमा हों आप
वही आफ़त-ए-दिल-ए-हकीम किसी रोज़ हम भी कहते थे किसी से....
अक्सर मेरे साथ तू रहती है तो तन्हाई क्यू रहती है i
ना जाने कहा ये निगाह-ए-आईना-साज़ में छुपी रहती है
मिया हम शेर है औए शेरो की गुर्राहट नहीं जाती
निगाहें भर भी उठी तो खाकसार हों जाती है ज़मी॥
ना होठ खिलते है अब ना तब्बसुम है किसी आँख का
शबनम से आंसू है मेरे और खैल दर्दमंदी है ये रात का ...
मेरी रहगुजर में तू ऐसे मिसाले-शरार ना देख ..
जल जायेगा "हकीम" निरे तिनको का बना है ये ..........
अजीयत-ऐ-जहा की अजार सी जमीं का रहनशी दयार है तू ..
चिरागों कों जलाए रखना अंधेरो में कम ही नजर आता हूँ मैं...
Friday, August 22, 2008
Thursday, August 21, 2008
वो रूसियाही आज इन फीजाओ मे
ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है
ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है
कल चीरागो मे तैल हमने भरा
अब ये काली सी रात फिर क्यू है
नींद पर आज लहु के छींटे
मुबागाचो मे साथ फिर क्यू है
तु तसल्ली मे सबसे पुछा फीरा
मेरे हाथ मे हाथ फिर क्यू है
कल किसी बात पर मोहल्ला फूंका
आज मेरे घर ये जमात फिर क्यू है
वो मरा ईक "हकीम" हमले मे
उसके हर्फो मे बात फिर क्यू है..
वो रूसियाही आज इन फीजाओ मे
ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है
ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है
कल चीरागो मे तैल हमने भरा
अब ये काली सी रात फिर क्यू है
नींद पर आज लहु के छींटे
मुबागाचो मे साथ फिर क्यू है
तु तसल्ली मे सबसे पुछा फीरा
मेरे हाथ मे हाथ फिर क्यू है
कल किसी बात पर मोहल्ला फूंका
आज मेरे घर ये जमात फिर क्यू है
वो मरा ईक "हकीम" हमले मे
उसके हर्फो मे बात फिर क्यू है..
Sunday, August 17, 2008
कटई सभई मोहे साल बरस ॥
मधु की चाह में जीवन बीता , मधु मिला मोहे तरस तरस ॥
सुर जीवन सूख गयो भादों सा , सावन चख्या जरस जरस ॥
जीभ स्वाद जेही चखे जनत, स्वाद चढा मोहे करस करस ॥
जा चढी रंग चढाईवे मोपे , रंग रहा युही मोहे उरस उरस ....
तनवा सुख मोहे भला लगा , मनवा सुख मेरा गरस गरस ॥
आज "हकीम" जू मुरख नरवा , ज्ञान ना पायो जरस जरस ....
मधु की चाह में जीवन बीता , मधु मिला मोहे तरस तरस ॥
सुर जीवन सूख गयो भादों सा , सावन चख्या जरस जरस ॥
जीभ स्वाद जेही चखे जनत, स्वाद चढा मोहे करस करस ॥
जा चढी रंग चढाईवे मोपे , रंग रहा युही मोहे उरस उरस ....
तनवा सुख मोहे भला लगा , मनवा सुख मेरा गरस गरस ॥
आज "हकीम" जू मुरख नरवा , ज्ञान ना पायो जरस जरस ....
Saturday, August 16, 2008
सफ़र करते समय उन लोगो के लीये जो दूसरो कों यह नहीं पता चलने देते की वे कोई भजन गा रहे है .....
( एक ही "द" अक्षर से कवीता कवीता बनाई है और दुसरे इस कवीता कों गाते हुए आपके होठ नहीं मिलेगे ...)
दीन दयाल दयालु दयानिधी , दरस दिखाओ दर्शन दो ..
दीन दशा दरसु दयानिधी, दास दोहे दस दर्शन दो..
देख दुखो दिशराह दिखाए , दया दरस दर दर्शन दो ॥
दास द्वारे दुदास दिखे, दूतो दाता द्वार दर्शन दो
देख दिखाए दिनकर दाता , द्वार दीन दुखो दर्शन दो
दासगुरु दल द्वार दिखाते , दास दरस दर दर्शन दो ..
हकीम जी
दीन दशा दरसु दयानिधी, दास दोहे दस दर्शन दो..
देख दुखो दिशराह दिखाए , दया दरस दर दर्शन दो ॥
दास द्वारे दुदास दिखे, दूतो दाता द्वार दर्शन दो
देख दिखाए दिनकर दाता , द्वार दीन दुखो दर्शन दो
दासगुरु दल द्वार दिखाते , दास दरस दर दर्शन दो ..
हकीम जी
Sunday, August 3, 2008
बच्चे बेचारे

जिन्हें देखकर तुम, सजाते दीवारे ।
ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे ॥
ये आंसू की धारा , ना बाती ना तैल।
ये रीते चीरागों की, खुरचन का मैल॥
ये गम की है साँसे, जमीदोज आसे
बडो से अक्लमंद, ये बच्चे ज़रा से ।
आँखों का मंजर , बुझी आग जैसे ,
ये खाली से चूल्हे ,जले आग कैसे,
समंदर में मिलते, बने झाग जैसे ,
बने तन पे नासूर,से दाग जैसे ,,
ये नूर-ऐ-अमावश, अँधेरा ये काला ।
जिन्हें ढूँढता ही ,नही है उजाला ,,
ये आंसू शर्म के , गरीबी ने फेंके ॥
जिन्हें नाज हिंद पे, कहा वे भी देखे
ये भारत के बेटे ,और माँ के दुलारे ॥
ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे,
"हकीम" की आँखों के, है ये सितारे
जिन्हें देखकर तुम , सजाते दीवारे ,
ये आशा से धूमिल है, बच्चे बेचारे
Friday, August 1, 2008
माना की तेरे हाथो में
उल्फत की ये डोर है
पर दिल में तेरे कुछ है
ओर होठो पे कुछ और है
माना की तेरी दीद के
कुछ आशकार राज है
स्नेह निर्झर सा पल्लवित
पल स्पन्दन चकौर है
तू गुल-ऐ-नगमा बेमजा
वस्ल -ऐ-नज़र न्याज़ है
अलख अकेर आखर
जेही प्रेम शौर है
प्राण रूप पावन धरा
वो शाम अभी दूर है
हिरदे आशा तपती धुप
दुपहरी सी और है
जीस्त-ऐ-हकीम बेवफा
पर शम्मा तजदीद है
इश्के सलासिल नूर पे
तज़लीले दीदे कोर है ..............
..गुरु कवी हकीम हरी हरण "हथौडा" हिन्दुस्तानी ..31.08..2008
उल्फत की ये डोर है
पर दिल में तेरे कुछ है
ओर होठो पे कुछ और है
माना की तेरी दीद के
कुछ आशकार राज है
स्नेह निर्झर सा पल्लवित
पल स्पन्दन चकौर है
तू गुल-ऐ-नगमा बेमजा
वस्ल -ऐ-नज़र न्याज़ है
अलख अकेर आखर
जेही प्रेम शौर है
प्राण रूप पावन धरा
वो शाम अभी दूर है
हिरदे आशा तपती धुप
दुपहरी सी और है
जीस्त-ऐ-हकीम बेवफा
पर शम्मा तजदीद है
इश्के सलासिल नूर पे
तज़लीले दीदे कोर है ..............
..गुरु कवी हकीम हरी हरण "हथौडा" हिन्दुस्तानी ..31.08..2008
Tuesday, July 29, 2008
पतझड़ और पहाड़
---------पतझड़ और पहाड़ ----------
पत्तो से सरकता
हुआ,
सुरलय ताल के साथ ,
सावन की रीम्झीम मे ,
गीरता हुआ पानी ,
बादलो से नही
पहाड की चोटी से
गिर रहा है .
सुखे पतझड पेड ,
दूर से देख रहे है ,
उस गिरते हुये पानी को ,
जो उंचा
ओर घना उंचा
होता जा रहा है ,
मरूभूमी के
विषेले हाथो से
बचने के लीये .........
---स्त्री बोध-----
जीवन पथ के
लम्बे गुजरते रास्तो पर,
एक बार नही
अनेको बार
मुझे अपने बोध का
अहसास हुआ है..
पिता की
गोद से लेकर ,
मा के आन्चल तक .
जीवन पथ के
लम्बे गुजरते रास्तो पर,
एक बार नही
अनेको बार
मुझे अपने बोध का
अहसास हुआ है..
पिता की
गोद से लेकर ,
मा के आन्चल तक .
गाव की गली से लेकर,
शहर की चोडी
सडक तक.
इस बोध के विष को
ना जाने कीतनी ही बार
पीना पडा है,
फिर भी इसका भार ,
मेरे व्यक्तीत्व को
नही दबा पाया है ,
क्यु की मैने तो
शहर की चोडी
सडक तक.
इस बोध के विष को
ना जाने कीतनी ही बार
पीना पडा है,
फिर भी इसका भार ,
मेरे व्यक्तीत्व को
नही दबा पाया है ,
क्यु की मैने तो
उसको हमेशा ,
हर बार काठ की तरह,
इसके उपर ही
तैरता पाया है ..............................................30.08.2008
हर बार काठ की तरह,
इसके उपर ही
तैरता पाया है ..............................................30.08.2008
Monday, July 28, 2008
चाह
घनी काली स्याह
पगडन्डी पर
उजली नीगाहो के
बीच मे,
आती हुई
वे अलसाई तस्वीरे
मन के कीसी कोने मे
दूर तक
पीडा की अनुभूति
छोड ही जाती है ..
स्याह सफेद पन्नो पर
ओर वक्त के
स्तनो पर
खून की परते
वर्सो से जमा
हो रही है
खून के सर से
आदमी बार बार
मुह फाडता है
मस्तिष्क का
अन्छुआ द्वार
जहा ग्यान व प्रकाश का
प्रवेश निषेध हे
अज ये चौराहे पर
नीलामी मे बिकता है
सलवट धारी
बीस्तर पर सीकता है
गहरी घाटी के
अथाह अन्धकार मे
टुटी हुई वो
पत्थर सी तस्वीरे
भविष्य के गर्त मे
भागती चली जाती है
केवल ओर केवल
जीने भर की
चाह के लीये...
पगडन्डी पर
उजली नीगाहो के
बीच मे,
आती हुई
वे अलसाई तस्वीरे
मन के कीसी कोने मे
दूर तक
पीडा की अनुभूति
छोड ही जाती है ..
स्याह सफेद पन्नो पर
ओर वक्त के
स्तनो पर
खून की परते
वर्सो से जमा
हो रही है
खून के सर से
आदमी बार बार
मुह फाडता है
मस्तिष्क का
अन्छुआ द्वार
जहा ग्यान व प्रकाश का
प्रवेश निषेध हे
अज ये चौराहे पर
नीलामी मे बिकता है
सलवट धारी
बीस्तर पर सीकता है
गहरी घाटी के
अथाह अन्धकार मे
टुटी हुई वो
पत्थर सी तस्वीरे
भविष्य के गर्त मे
भागती चली जाती है
केवल ओर केवल
जीने भर की
चाह के लीये...
गुरु
गुरु गोविन्द सिह रई बनाईगे
मो काठ पडो तपे नीर पवनवा
धकी धकी धोकनी गुरु सीखायेगे
शेष तभु जनो शीश झुकईवा
हाड मास खगऊ सा नरवा
सुती सुती मोहे सुधा चमनवा
तीरे खाड रहो जकु ताकु
तार दीयो मोहे आज जनमवा
निर आखर निरगयान रहु जस
जड्मती तारी स्वाती रचुऊवा
बार जन्म लख काड खलईवा
कबहू "हकीम" ना तार जनमवा..............
मो काठ पडो तपे नीर पवनवा
धकी धकी धोकनी गुरु सीखायेगे
शेष तभु जनो शीश झुकईवा
हाड मास खगऊ सा नरवा
सुती सुती मोहे सुधा चमनवा
तीरे खाड रहो जकु ताकु
तार दीयो मोहे आज जनमवा
निर आखर निरगयान रहु जस
जड्मती तारी स्वाती रचुऊवा
बार जन्म लख काड खलईवा
कबहू "हकीम" ना तार जनमवा..............
29.07.2008...गुरु कवी हकीम हरीहरण हथोडा..
हकीम का रहस्यवाद
मै बनु मन के बीच कटोरा ....
जग सात समन्द बसोरा, ये राज कमल यु ही भोरा
ना गात ना माटी गोरा, अलसेई मनु जन धोरा
चीरवानी अन्ग कसोरा, ना गात बागीसा धोरा
यह सब हू बिछोवा मोरा, डसे काल सुपारी चोरा
नीकसो भागो ये झझोरा,रुई लिपट अग्न की तोरा
ले "हकीम" तु बाती डोरा, उजला कपडा सीये मोरा....
जग सात समन्द बसोरा, ये राज कमल यु ही भोरा
ना गात ना माटी गोरा, अलसेई मनु जन धोरा
चीरवानी अन्ग कसोरा, ना गात बागीसा धोरा
यह सब हू बिछोवा मोरा, डसे काल सुपारी चोरा
नीकसो भागो ये झझोरा,रुई लिपट अग्न की तोरा
ले "हकीम" तु बाती डोरा, उजला कपडा सीये मोरा....
Sunday, July 27, 2008
घुन लगी परवाह
कवी बी.एस. चरण बेकस...हिन्दी काव्य जगत की एक नई शान..
मेरी परवाह करती हो,
मेरी चाह करती हो,
रहमत तेरी है ,
किस्मत मेरी है,
कि तुम मेरी चाह करती हो,
मेरी परवाह करती हो,
बरसो पहले,
मेले में अकेले में,
हम भी तुझे याद करते थे,
दिल में घर बनाते थे,
उसमे तुझे बुलाते थे,
और तुम आते थे,
तब में औरों से कहता था,
की,
तुम, मेरी चाह करते थे,
मेरी परवाह करते थे,
अब तुम शीशे के महल में रहते हो,
और खुद को तनहा कहते हो,
अब ये दिल रोता है,
घर भी खाली है,
क्यूंकि,
तुमने बस्ती कहीं दूर बसाली है,
और औरों से कहते हो कि ,
मेरी चाह करते हो,
मेरी परवाह करते हो,
ये रहमत तेरी है,
और किस्मत मेरी है ,
कि तुम मेरी चाह करते हो,
मेरी परवाह करते हो.......BS Charan Bekas
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