Tuesday, November 25, 2008

कही दूर चले.......

आ चल चल के कही दूर चले
मन रीता है मजबूर चले
ये सकल पथ सब घूम चले
आ चल चल के कही दूर चले......

ये शक्त शिरा‌एँ व्याकुल है
व्यथित है ह्रदय के बंधन
इन भाव विभोर नयनो में
नैसर्गिकता के है ये छंदन
ये दूर भागते पथ आँगन
दल नभ नयनो में घूर चले
आ चल चल के कही दूर चले ......

तप रे मन सजल-स्वर्ण से पावन
मूर्तिमान सपनों में रे ले चल मन
ढल रे, ढल आतुर मन
मन पंडित जाने ना जाने मन
अतिशय सुख के दस्तूर चले
आ चल चल के कही दूर चले ........



.......गुरु कवि हकीम........

Tuesday, October 28, 2008

प्राणों से

बढ़कर प्रीत हुई

सोई साँसे संगीत हुई

मन ठहर गया

हिहर गया

सपनों सी मेरी जीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

ठहर ठहर मैं इतराता

समय पकड़ कर कर झुठलाता

जग दोष मेरा बेमोल हुआ

शब्दों में वो अनमोल हुआ

सपने जागे

मेरा मन भागे

रोती साँसे भी गीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

जीवन की धारा हसरत थी

रुकने की कीसको फुरसत थी

मुट्ठी भर सपने पाने कों

चुटकी भर जीवन जीने कों

अलसाई इन पलकों में

उलटी धारा भी रीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा

किरणों में अंकीत सी रेखा

पथ परिचित में आगे बढ़ता

तारो के बादल में चढ़ता

मन आलोक गगन कों छूकर

अभिलाषा के अंत के ऊपर

पल-भर परिचित मनमीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

हम ख्वाब देखते दर्पण में........

हम ख्वाब देखते दर्पण में

ख्वाबो के पूर्जे जोड़ रहे

एक बूँद जहर सा प्याले में

शीशे में दर्पण तोड़ रहे

यहाँ लहू में लथ पथ सीने है

जानिब थक बैठे पीने है

पीते पीते इन शीशो में

हम अक्श तुम्हारा छोड़ रहे ......

गम जब्ज किया है फूलो सा

नश्तर चुभता एक शूलो सा

एक सफ़र ताब जिंदगानी कों

दश्ते उल्फत में मोड़ रहे .....

हर अश्क में खुशीयाँ रोती है

आँखों में हसरत सोती है

ये जुर्म-ए-मौहब्बत है साकी

टूटा इकरार रहा बाकी

खाली हर्फो के पन्नो पर

रीते शब्दों कों जोड़ रहे ...... ........गुरु कवि हकीम

Saturday, October 25, 2008

भंगुर है संसार

दर्रों के इन क़दमों में

भंगुर है संसार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार

लज्जारुण चेहरा

ये शहर नख़्लिस्तान

बनजारों देश में

नहीं होता कब्रिस्तान

दफ़न सब रश्मे यहाँ

भूखे भेड़िए सा प्यार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार

सौदा-ए-मुहब्बत की

बातो के सहारे

रोते सर पकड़ के

दुखो के सब मारे

धोखा इनकी फितरत

फरेब इनकी यारी

नकली से है चहरे

लोमड की होशयारी

तेरी इस दुनिया में

इनकी ही भरमार

तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार

चार दिन बसेरा

और बाते लम्बी चोडी

इन्सां के आँगन में

खुशिया कितनी थोड़ी

सुबह जागे खुशिया

दोपहर तक है तपती

शाम आते आते

सारी खुशिया थकती

सीने से लगाए तू

काहे ये गुब्बार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार ........गुरु कवि हकीम

Wednesday, October 22, 2008

मन डोर............

कण-कण लौ जगी उससे
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
चुपके से पदचाप
जवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....................





गुरु कवि हाकीम.........................


...............

Tuesday, October 21, 2008

अशकारो में जलते है अब
ईमान की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही......
खुशिया लूटती दहशत बढ़ती
हर सोच यहाँ मरकज चढ़ती
नफ़रत ने मोहब्बत को घूरा
शैतान की नियत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही .......
तम्हीद-ए-सितम तासीर यहाँ
ख़ुद ही होश गवा बैठे
होश-ए-ख़िल्वत हुई रुखसत
नजर--सय्याद जवां बैठे
सौदाइयो की बस्ती में
सामान की कीमत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........
रहबर छूटते दामन बटते
ख़ुदनिगरी की अंगड़ाई है
मुश्किल आलम रूश्वाई का
झुर्मुट की ये गहराई है
सरमायो का ये मन्दिर है
बैठी सूरत एक भोली सी
सरमायो के इस मन्दिर में
भावान की सूरत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही..........
एकाकीपन में जीते है
कशिश-ओ-जज़्ब की बात कहा
मायूसी की इस नगरी में
ख़ामोश फ़ज़ाओं सी रात यहाँ
तासीर तसव्वुर चूर हुए
टकरा ही हम टूट गए
टूटा मोटी बिखरी माला
जख्म यहाँ नासूर हुए
हर चीज में मिलती सैय्यारी
नेकी की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........


चाँद ज़रा माध्यम नीकले...

जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स--लताफ़त रोती है
वो आयेगा तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
पा जाए मुरादे शायद तू
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले
जब चाँद तेरा माध्यम नीकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
कोई मन के तार झंझोरेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले

दो पैसो में इंसान बिके ....

सैय्याद की दौलत बिखरी है
इस दौलत में हर शान बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....
ईमान बिके बे-ईमान बिके
यहाँ देश धर्म की शान बिके
उजले बिकते काले बिकते
मंदीर बिकते मस्जिद बिकते
पुरपेंच जमाने में सारे
रहबर के सब भगवान् बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके .....
धन बल की माया जारी है
बिकती हुई तन से नारी है
अधखिली ज़र्द सी कलियों में
सौदायो की भारमारी है
नीलामघरो के जीनो में
माँ बहनों की यहाँ आन बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....... ......guru kavi kahim......

तस्व्वुर वफ़ा....

तस्व्वुर वफ़ा एक पशेमान सी
मेरे शब्दों में है वो कहानी बहुत
जि़न्दगानी बादा सागर है जवां
मेरे शब्दों में है वो जवानी बहुत
इन्तेज़ा बेकरारी तवज्ज़ुन बढे
मेरी धड़कन है मैं वो रवानी बहुत
बीक चुके दिल के अरमान कई मोड़ पर
रास्ते की डगर है सुहानी बहुत
ये मोहब्बत के नग्मे मुतिरब से है
दुनिया है इनकी दीवानी बहुत
फकत उम्र अब तो फना हों चुकी
मेरे शब्दों में अब भी जवानी बहुत...
अभी छोड़ ना दिल के नग्मे 'हकीम'
हयात-ऐ-वफ़ा जिंदगानी बहुत

पीना छोड दो ......

दुनिया कहती है कि पीना छोड दो
ये क्यू नहीं कहती की जीना छोड दो
नुमाया जिन्दगी की तल्खिया लिए
जवां सीने में धड़कने जोड दो
मिज़ाज-ए-अजिजि हमें क्या पता
कोई आके मेरे दिल में वो छोड़ दो
भीगी पलको से हम आज रोते रहे
दरगाय-ऐ-मोहब्बत कोई मोड़ दो
सोचता हूँ बसर घर कोई मैं करू
पेश-ऐ-नश्तर जिगर अब कोई तोड़ दो
गिराँबार तेरी नजर का सिला
तसव्वुर में आके शम्मा छोड़ दो
यख़बस्ता उदासी है दिल में "हकीम"
शुआ जीस्त कोई मुझे मोड़ दो ...

Friday, October 17, 2008

युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये

युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये

फकत हर जख्मो कों चहरे का आईना ना कहो
कहानी मेरी दर्द-ए-मोहब्बत की दास्ताँ ना कहो

कफस की स्याही रोकती है हवा-ए-शौक़ की कुव्वत
महसूस होती जिन्दगी कों खालिस रोशनाई ना कहो

दोस्त के हाथो ने उठा रखी है आज दुश्मन की तलवार
हमने तो गले लगाया है जयचंदों कों उसे गद्दार ना कहो

निगाह-ए-जमाल में हमारे ऐबो कों गिनाओ जमाने भर में
मगर हमारी अक्स-ए-सोज़-ए-दिल के सामने बुरा ना कहो

मिज़ाज-ए-आजिजी ना दे सको तो कोई बात नहीं "हकीम"
इन नकली चेहरों के आइनों में माहौल अह्द-ए- वफ़ा ना कहो ..

छाया: रचानाएं आमंत्रित

छाया: रचानाएं आमंत्रित

जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स--लताफ़त रोती है
वो आयेगा अब तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
मिट जायेगी राते अब काली
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब ना नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
चहू और उजाला फैलेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
बस चाँद ज़रा माध्यम नीकले .....GURU KAVI HAKIM.......

Thursday, October 16, 2008

कण-कण लौ जगी उससे
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की
मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की
मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
पदचाप जवानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की.................GURU KAVI HAKIM................

Tuesday, October 14, 2008

पथ पेम

पथ प्रेम ये सीध सामान बना ,
छूटे भय-शंसय और खोट नहीं

चित चंचल मन व्याकुल बाते ,

नि:संशय ह्रदय कोई चोट नहीं

जीवन लतिका सुर मधुर मुक्त ,

ये गतिमय स्त्रोत झंझात नहीं

कुछ शेष रहा शैशव यौवन दर्पण,

ये अवशेष चांदनी रात नहीं

अधिराए बदरीया काली क्यू ,

ये मनुजोचित प्रीत सी बात नहीं

हृदय में ये छल क्यों पनपे ,

कहता पल पल सुधि साथ नहीं

तुम नित नित रचना रचती हों ,

यहाँ प्राणों का आघात नहीं

तुम सब कुछ छीन चली पाती ,

हृदय में खुशी की बात नहीं



गुरु कवि हकीम
पथ प्रेम सजा तू अब राधा ,
माधव तबहू नाही कातर हिरदे ,प्रेम बढ़त होय विरह आधा ।
अब कै तार तिये सूत नोका , सूनुह प्रात भावः विहल साधा
तोरी रटु बिछिया सी बतीया ,लीये जिए नछत्र सा अनुराधा
इबिही प्रेम पथि तोई विधिना राखो ,जोई चुनर सुई हुई बाधा
अपवश नयन ना चितोर भरउ अबू ,करी सूनी बात सुनो माधा
दियौ अभेद "हकीम" गती दाउँ ,समरथ सुमिरन जो बलि राधा ......
जानत मर्म दुहूँ तहों बीचु राखिबै ,
कौ जानू कबहू बिसरायो जई ॥

जणू सूनी भाव "हकीम" जू मीडै ,

मनोरथ चटाक बिखरायो जई ........


गुरु कवि हकीम ..........

Saturday, October 11, 2008

ये अँधेरा घना
नग तम् से बड़ा
उसका सीना तना
लौ डरने लगी
हौसला ना छिना
कर के हिम्मत कों वो
बढ़ के यु खिल गई
अँधेरा भी गया
नग की नींव हिल गई
नतमस्तक पहाड़
अँधेरे की दहाड़
कंदन से काह
सारी तिम छिल गई

कंदन =पत्थर फोड़ना
काह= अन्धकार से बाहर निकलना
इज़हार करू तो कैसे करू ...
दिल नीस्त रहा मुतजात बना

इज़हार करू तो कैसे करू
चीस्त मेरा तिहीदस्त रहा
मैं इशक करू तो कैसे करू
एक जहा ढूंडा गरचे हमने
वहा पर भी पर्दा नाशाद्काम
वो सात तहों के भीतर था
मैं आबादस्त था बिना जाम
लबरेज झलकते जामो का
इशआर करू तो कैसे करू ......
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
एक शाम इम्तिदादे कैफ लीये
जामे तरतीब पीये हमने
बादये कुहन के शीशो में
शब -ऐ-पैगाम जिए हमने
हर शाम तुलुअ की तारीकी
तन्हाइयो में रोया करते
बियाबान गुजरते पहलू में
महदूद करू तो कैसे करू
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू ..........guru kavi hakim.....

संसार जगत एक अंध कूप ......

संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप
उस पार समंदर पर्वत है
इस पार नदी का खुला रूप
इंसा बटता खुशिया रोती
और भूख में है भाषा सोती
जहा मौत नाचती दौराहे
ले हाथो में पत्थर स्वरुप
संसार जगत एक अंध कूप
संसार जगत एक खिली धूप .....
ये लोक गतानुगति का है
सबकी विस्मृत सहमति का है
अलसित जीवन की धारा पर
यहाँ टूट रहे शिथिल कुरूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप ......
संसार सोच एक दर्पण है
प्राणों के भीतर अर्पण है
करुणा पिसती अंधियारे है
अवसादों के आँगन सारे है
यहाँ रोज़ सुलगती साँसों में
जीवन रचता अनुप्रीत अनूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप .....guru kavi hakim

Monday, October 6, 2008

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
सोई साँसे संगीत हुई
मन ठहर गया
मन हिहर गया
सपनों सी मेरी जीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
ठहर ठहर मैं इतराता
समय पकड़ कर कर झुठलाता
जग दोष मेरा बेमोल हुआ
शब्दों में वो अनमोल हुआ
सपने जागे
मेरा मन भागे
रोती साँसे भी गीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
जीवन की धारा हसरत थी
रुकने की कीसको फुरसत थी
मुट्ठी भर सपने पाने कों
चुटकी भर जीवन जीने कों
अलसाई इन पलकों में
उलटी धारा भी रीत
हुई प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा
किरणों में अंकीत सी रेखा
पथ परिचित में आगे बढ़ता
तारो के बादल में चढ़ता
मन आलोक गगन कों छूकर
अभिलाषा के अंत के ऊपर
पल-भर परिचित मनमीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

Saturday, October 4, 2008

इंसान बिके एक धेले में

मेरा साहब कहे अकेले में
निरमोही जगत झमेले में
आखन देखी झूट लगे
जागत रहियो इस मेले में
समझावत हारा मन मोरा
ये रंग बिरंगी सा डोरा
मैं ढूंदत ढूंदत ढूंड फिरा
मैं बिचल गया इस रेले में
रे सुन "हकीम" बाती तेरी
मैं रोऊ आज अकेले में
निरमोही जगत झमेले में
इंसान बिके एक धेले में
ये चेतन मन जब कहता है
अकलुष सपनों सा बहता है
जब विश्व-वेदना बढ़ती है
निष्ठुर व्यथा तब चढ़ती है
इस विश्व-वेदना के भीतर
अकुलाऊ आज अकेले में
पाप पुन्य जहा गले मीले
और रहते एक ही थेले मैं
मेरा साहब कहे अकेले में
इंसान बिके एक धेले में
निर्मोही जगत झमेले में

तेरे प्यार मैं........

मन बांधे ,बंधू मैं

तेरे प्यार में ,

सपने पुलकित हरीतिमा ,

तेरे प्यार में

पथ पथ पे बिखरा

सुनहरा सा रूप ,

मधु मरन्द भर कर

खिली जैसी धूप .

सिर्फ एक शब्द है ,

विरहाकुल सी हद है .

विषय वश हुआ मैं ,

अधर चूम कर ,

कुमुद दल पे भंवरे

सकल घूम कर ,

मन के सीते है धाँगे

तेरे प्यार में

मन बांधे ,बंधू मैं

तेरे प्यार में .......

ये द्रवित प्राणों का

भय अब नहीं

ह्रदय के भीतर

भ्रम अब नहीं

साँसे बिखरी थी

जो मेरे कल

आलिंगन करती है

वो पल पल,

छूकर जीवन की

मुरली की धुन

सजल- स्वर्ण

सपने बुने प्रतिपल,

मैं रीते ह्रदय का

बनू मुक्त बंधन

तेरे प्यार में .....

मन बांधे ,बंधू मैं

तेरे प्यार में ......... Guru Kavi Hakim.......

Saturday, September 13, 2008

प्रबल वेग की धारा सा
मन संताप बढ़ा मन में
मानवता के इस क्रंदन पर
शापित आक्रोश जगा जन में
काली अंधियारी रातो का द्वेष
उर उजियारे में फैलाता क्‍लेश
नफ़रत का ये घौर अँधेरा
ना तेरा है ना ही मेरा
कब जागे बुद्धा की बाते
ह्रदय बीच उनके कण कण में ......
मौत बाटते काले बादल
मृत्‍यु नाच आँगन में वसुधा के करते
पावन अमृत में अनीति का विषपान है भरते
फूँक रहे पेडो की धरती
आग बुझेगी कब ये वन में .......
कौन बचेगा ज्वाल लहर से
कौन जियेगा व्यथा जहर से
जिन पत्तो से आँगन रचते
कौन बिंधेगा रूद्र कहर से
व्याकुल हूँ इस छल पीडा से
व्याकुल हूँ इस मिथ्या से
उमड़-उमड़ कर सपने छलते
स्पन्दन करते उन्मन में.......

----------कवि हकीम ------------

सड़क के खाली पन्ने.....


सड़क के खाली पन्ने

दूर तक

निगाहों का का सफर

और विचरण करते हुए

हमसायो के बीच

आस्तित्व की रक्षा को

आतुर इंसानी सोच

बहुत बीच के फासलों से

गुजरता हुआ

फिर आ जाता है

परिधी के

चक्कर सा काटता

उसी बिन्दु पर

जहा से आरम्भ

हुआ था

सोच का सफर

शुन्य की खोज में

रीते हुए

खाली पन्नो पर...

Friday, September 12, 2008

इस उजले पथियारे पथ से
बीच धरा के मृदुल रथ से
मुझे जन्म दो माँ
बाट सकू पथ पीडा मन की
विद्युत-छबि उर नवजीवन की
तिमिर भेद प्रकाश उबेरू
उन्‍मन पुष्‍प गति बखेरू
ज्योति ज्योति नव प्राण खीच कर
हर जीवन में अमृत सींच कर
नभ हाथो से तारे छुलू
मुझे जन्म दो माँ
रोक सकू अंधियारा सब का
बाँध सकू उर उजियारा सब का
नहीं त्रास नहीं प्यास बचे अब
क्षुब्ध, लुब्ध तूफ़ान सजे अब
रचो रक्ष शुक्ति मरूपथ से
अंत ना हों दुर्लभ परिपथ से
मुझे जन्म दो माँ
जन्म दो माँ

Monday, September 8, 2008

नुकताची बढ़ती गई, दिल के तारे ना जले
अब जमाने में भला ,खुद-ब-खुद कर्ब चले

कमरी रातो का समा ,दिल का दस्तगीर बने
फिर वो मावस की सबा, नग्जे हरबार खिले

मैं फकत ताइब तेरा ,जाब्ते गम मैंने कीये
बुगज बढाता ही गया ,ना मिटे दिल के सिले

ये अजीयत सा शमा, तजल्जुल करता सहर
गमख्वारी ना मिली , फिर होके ग़मगीन चले ...


कर्ब = व्याकुलता /पीडा
कमरी = चांदनी
दस्तगीर = मददगार
मावस = काली अंधेरी रात
सबा = वक्त
नग्जे = अदभुत हालत
ताइब = बुरी आदत पर अलग रहने की प्रतिग्या करने वाला
जाब्ते गम = दुखो उजागर ना करने वाला
बुगज = मन में रखे जाने वाला बैर
अजीयत = यातना ,दुःख
तजल्जुल = कम्पन
सहर= सवेरा
गमख्वारी= सहायता
ग़मगीन= दुखो से व्याकुल

.............हकीम साहिब .......

Wednesday, September 3, 2008

शब्द

यहाँ व्याकुल से
शब्द खड़े है
परिधानों में
शब्द जड़े है
मेरे इन शब्दों में
तुम हों
मेरी इन आँखों में
तुम हों
जीन शब्दों से
साँसे पिघले
मेरी उन साँसों में
तुम हों
अपने शब्द ,
मै गाऊ कैसे
तार है टुटे
मन के ऐसे
एक नही दस
ओर खडे है
कीसको मारु
पास बढे है
गलत बने सब
गोरख धन्दे
गान्ठ के पुरे
आन्ख के अन्धे
यहा ........
बढता ही जाये सन्ग्राम .........
कसम से हम....
रह जाते है दिल थाम ..

Tuesday, September 2, 2008

ये मंजर ....


ये मंजर दिल जलाता है इन्तेबा है बहुत बाकी
अभी से हाल बर्गे -ऐ- दिल, अभी मंजिल बहुत बाकी ॥


बताते हों जो हिचकियों से हमारा राज राह दहरे
सितम सीने में गाफिल है ,अभी बाते बहुत बाकी

तवक्को तुम नहीं करते , शिकायत आज सारी है
स्याह रातो से तुम डरते , अभी राते बहुत बाकी

सब-ऐ-गम की ये शायारी परेशाँ आज हम भी है
रहो परदों में तुम हज़रत ,हजाते है बहुत बाकी

नही फिकरे गम -ऐ--मंजिल मैं डरता हूँ हिकारत से
वस्ल रख अब हयाते तुम , तिजारत अब नही बाकी ....

Monday, September 1, 2008

हिज्र की पहली शमा दिल में असर करती है
शब समंदर की तरह तेग़-ए-सितम करती है

सहर के दम से आतिश का मजा आता है
सर-ए-महज़र की तरह बर्ग बसर करती है

बट गई साँसे यहाँ तकसीम नजर दिखती है
आने वाली जो बजू सफिरो सा सफ़र करती है

रोज़ आती है सदा पढ़ के किताबो से अता
अफ़सुर्दा बरखो में लिखी बाते असर करती है
अनुनय ह्रदय की मौन हवा
जीवन पथ के निर्ज़न वन में
ज्योत्स्ना का प्राण बिंदु है
जहा देह के देवता
सतत ह्रदय कों अभिलाषा के
पयोनिधिस्वरुप कों विप्लव के साथ
मनस्ताप के
बहुत भीतर तक खोजते रहते है
और हम
क्षुब्ध शब्दों के पास
बैठकर बाते करते है
प्रागंण में सुनतीवो अनजान अनुभूति
हमारी नियमन बातो कों
कान के उस छौर में
संजोह लेती है
और स्वम प्रतिपल सी
ओझल हों जाती है
हमारी स्फुलिग द्रष्टी के सामने से
शब्दों का बहाव
अपने आप में
उस विभिश्ना का प्रतिरूप है
जो हमारे ह्रदय के
अन्त्स्वरूप स्रोतों से
फूटकर बहार आता है
गतिमय प्रवाह और
परवशता की भांती
मैं अकेला बैठा
उस निर्जन चट्टान का
स्वरुप बनने लगता हूँ
जो समय और काल के हाथो
चेतना के
उन क्षण कों जोड़कर
अपने आप कों
खडा कर पाती है
उस जमीं पर
जहा उसका स्वरुप
अपने आस्तित्व कों
निर्मित करता है ......

Sunday, August 31, 2008

एतबार तो कर यु चुप ना रहो दानिश्ता शिकायत भूल भी जा
खामौश लबो कों खोल भी दे बानिश्ता ये शिकवा भूल भी जा
तकमील-ऐ-जफा अब याद ना कर अंजाम कयामत भूल भी जा
नजरो की सदा टकरा के ना मुड तासीर गुरेजां भूल भी जा
हर रोज़ नहीं एक रोज़ सही दहशत की ये बाते भूल भी जा
हमराज फकत इनकार ना कर नाहक ये सितम भूल भी जा

इशक मासूम...



जीस्त नासूर-ऐ-गुल-ऐ-बां में जिगर सोता है

पाक दामन के गिरेबां में वस्ल होता है
शर्म दामन में फना बंदगी सा रोता है
इशक मासूम जवानी में फ़ना होता है
वस्ल मासूम कहे मुझसे सदा
जिन्दगी तेरी .... बंदगी मेरी......................गुरु कवि हकीम...

Friday, August 29, 2008

सूरज निकला आँखे मलते ..

सूरज निकला आँखे मलते
अंधियारे से चलते चलते
राह देख रही है सुबह
मन तृष्णा में जलते जलते
स्वपनिल आशा किरण पसेरी
सींचे मन में सब उजयेरी
हर्षित मन जब पाव पसारे
धूप चखु अपने हीस्से की
अंधियारा मन ढलते ढलते ....
आँखे भीगी मन मुस्काये
हँसते हँसते पलके गाये
समझ ना पाऊ जब भाषा में
खामौशी मुझे राह दिखाए
दूर छितिज पर हंसते तारे
ह्रदय वास पर जलते जलते .......
किसी का साथ नीगाहों में बस गया जब भी
दराज हों के पनाहों में बस गया जब भी

हज़ार झोके उलझते है मुख्तसर बन के
बहार हों के हवाओं में बस गया जब भी

क्यू हमसे पूछे जमाने में रहगुजर तेरी
एजाज़ हों के ज़माने में बस गया जब भी

आमादा हूँ अब सफ़र सुकूँ-ए-राहो में
पयामे हुशन सजाने में बस गया जब भी

कही चिराग से खैरामे जख्म जलता है
हुस्न-ओ-इश्क़ मनाने में बस गया भी

"हकीम" नश्तर निगाह -ए- इश्क आज चुभे
आशना हों के तरानो में बस गया जब भी

Thursday, August 28, 2008

मैं यूही शौक से हार जाता हूँ बाजी तुझसे ॥
ताकी तुम हँसते रहो मेरे प्यार की खातिर ॥
मैं कजा कों भी हरा दुंगा अपनी हसरत से
ताकी तुम जिंदा रहो मेरे प्यार की खातिर
इश्क जाहीली में पशेमान है ये जुलो सितम
ताकी शर्मिन्दा ना हों मेरे प्यार की खातिर
कितनी फुरसत से जोड़ी ये तकसीम-ऐ-शाई
फासले दरमयां ना हों मेरे प्यार की खातिर
ऐ ग़म-ए-दुनिया तेरे गम का तस्व्वुर हूँ मैं
तू गमजदा ना रहो मेरे प्यार की खातिर
होठ ताकीद है और बेच दी गैरत "हकीम"
ताकी बंदगानी ना हों मेरे प्यार की खातिर ......

Wednesday, August 27, 2008

क़रार दिल में आये

मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये
मस्ती नज्म सी हस्ती
मुतिरब सा दिल गाये
मैं वाल्ले वाल्ले चालू
क़रार दिल में आये ....
ऐ ग़म-ए-दुनिया किलवत
चश्म-ओ-आरिज़ सी तिबयत
तस्व्वुर मन के सारे
यु दिल में गुदगुदाए
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये .....
शाने शिकवा किसका
जि़न्दगानी बादा जिसका
मुनहमिक मन तेरा
तुर्बत में मुस्कराए
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये ....
सदाकत इश्क -ऐ-नजरे
ख्वाब-ऐ-हकीकत सजरे
जशनो वादा ये फरदा
अहसासी गुल खिलाये
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये .....
मसकन के पीछे हम भी
अहद-ए-जुबां सा गम भी
"हकीम" गीत कायल
ऐतबार मन में आये
मैं वाल्ले वाल्ले चालु
क़रार दिल में आये ..

Tuesday, August 26, 2008

हम अकेले ही चले

हम अकेले ही चले....




हम अकेले ही चले
चार दिन के थे सिले
हम अकेले ही चले
दिल ये इब्दाद हुआ
इश्क बर्बाद हुआ
बंद कलियों में यहाँ
फूल देखो है खीले ,,,.............हम अकेले ही चले
प्यार तोहमत था बना
जुल्म था धुल सना
हम तो कांटो में चले
करम थे उनके भले ...............हम अकेले ही चले
सांस रोती ही रही
आस सोती ही रही
शूल यु दिल चुभे
जब वो हंसते से मिले...........हम अकेले ही चले
थक चुका लंबा सफ़र
आंसू जज्बो का हसर
हम तमाशा क्यू बने
उनके ये शिकवे गिले ..........हम अकेले ही चले
हर्फो का ये है बयाँ
खून की थी वो हया
लहू आँखों में मगर
होठ ना तब भी हिले.............हम अकेले ही चले
जज्बा यु सारा जकड
होसला अपना पकड़
बढ़ते मकसूदे कदम
जा के मंजील से मिले.............हम अकेले ही चले

Monday, August 25, 2008

घर आवे साजन

हाथिये चढ़ल आयो साजन
साखी री मन मौर सा नाचे
माई री मन मोरो यु अकुलावे
आँखों के कोनो में सपने सजावे
घोड़बे चढ़ल घर आवे
साखी री मन मौर सा नाचे ....
श्याम संगे जब सन्नर महके
मुतियन आंसू जानैत दहके
कथिये चढ़ल घर चहके
साखी री मन मौर सा नाचे
लाख जन्म का सखी मोरो साजन
अन्देशबा लागि जारि मिझा आजन
मोटरवा चढ़ल घर बाजन
साखी री मन मौर सा नाचे
आज अंगनवा "गुरु" पडी चरणा
कोने नगरिया छोड़बा धरणा
जेही पैदल चलब घर आवे
साखी री मन मौर सा नाचे ......
जब रात हुई बरसात हुई
भीगा मन भीगी बात हुई
रोने के लीये सारा जग है
हसने की ना कोई बात हुई
जब गम की रेल नीकलती थी
यहा पटरीयो सी हालात हुई
जब सुबह हुई बादल पुछे
हकीम क्या कोई बात हुई
आंसू नीकले तन्हाई मे
मन पीडा सी जब साथ हुई

गुरुवा आ गया रे मेरे लाल

गुरुवा आ गयो रे मेरे लाल ..
गयो रे मरे लाल , दिल पे छा गयो रे मेरे लाल ..
दीपक बन उजियारा लाया, बना मृदुल मोम सा ढाल
निर्जन मन तारे पुन नवरंग,सए पूछय सैसव काल
दीप-बाति आपुन संगम, जजमान सा रूप विकाल
संग बती मोहे चांदी जडिया ,भरी भरी सुख तै ताल
कहे "गुरु" जग बाती मोरी , पर ब्रह्म दीया मेरे लाल ............

Sunday, August 24, 2008

प्यार तू मेरे सुधर भी जा
ना भोले पन में मुझको फंसा
ना मैं तेरी ना तू मेरा
इस तरह से मेरा दिल ना जला...
यार तू मेरे सुधर भी जा
तू है भोला
और मतवाला
तेरी आँखे गोल
मैं डावा दोल
एक बार तों कर तू
मुझसे प्यार
फिर दुनीया में तू
किधर भी जा ............ए प्यार तू मेरे सुधर भी जा
तेरा मन सुन्दर
तेरा दिल सुन्दर
सुन्दरता का तू रखवाला
तू राग बंसंती बना फिरे
मैं हू तेरी मधुशाला
पी प्याले को इस
तरह से तू
कही इसकी खुशबु
बिखर ना जा ........ऐ प्यार तू मेरे सुधर भी जा
कभी गलियों में उनकी जाना हों कहीये उनसे की बेवफा......

एक " हकीम" दिल--मुज़तरिब से राह तकता है तुम्हारी ....


ये तुम्हारी प्यार की बाते मिज़्ह्ग़ाँ जिस के ग़म में पशेमा हों आप

वही आफ़त-ए-दिल-ए-हकीम किसी रोज़ हम भी कहते थे किसी से....



अक्सर मेरे साथ तू रहती है तो तन्हाई क्यू रहती है i
ना जाने कहा ये निगाह-ए-आईना-साज़ में छुपी रहती है

मिया हम शेर है औए शेरो की गुर्राहट नहीं जाती
निगाहें भर भी उठी तो खाकसार हों जाती है ज़मी॥


ना होठ खिलते है अब ना तब्बसुम है किसी आँख का
शबनम से आंसू है मेरे और खैल दर्दमंदी है ये रात का ...

मेरी रहगुजर में तू ऐसे मिसाले-शरार ना देख ..
जल जायेगा "हकीम" निरे तिनको का बना है ये ..........


अजीयत-ऐ-जहा की अजार सी जमीं का रहनशी दयार है तू ..
चिरागों कों जलाए रखना अंधेरो में कम ही नजर आता हूँ मैं...




Friday, August 22, 2008

यु रिफ़अत सहर से लबरेज है रोशन तेरा चिराग़े-हिदायत..
इन हर्फो के एजाज़ कों फिक्रे-फ़लक तब्दील कर "हकीम".....

रिफ़अत=बहुत बड़ा
सहर= चमकता हुआ सवेरा
लबरेज= भरपूर
चिरागे हिदायत = ज्ञान का दीपक
एजाज = चमत्कार
फ़िक्र-ऐ-फलक= महान चिंतन

Thursday, August 21, 2008

वो रूसियाही आज इन फीजाओ मे

ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है



कल चीरागो मे तैल हमने भरा

अब ये काली सी रात फिर क्यू है



नींद पर आज लहु के छींटे

मुबागाचो मे साथ फिर क्यू है



तु तसल्ली मे सबसे पुछा फीरा

मेरे हाथ मे हाथ
फिर क्यू है



कल किसी बात पर मोहल्ला फूंका

आज मेरे घर ये जमात फिर क्यू है



वो मरा ईक "हकीम" हमले मे

उसके हर्फो मे बात फिर क्यू है..
वो रूसियाही आज इन फीजाओ मे

ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है



कल चीरागो मे तैल हमने भरा

अब ये काली सी रात फिर क्यू है



नींद पर आज लहु के छींटे

मुबागाचो मे साथ फिर क्यू है



तु तसल्ली मे सबसे पुछा फीरा

मेरे हाथ मे हाथ
फिर क्यू है



कल किसी बात पर मोहल्ला फूंका

आज मेरे घर ये जमात फिर क्यू है



वो मरा ईक "हकीम" हमले मे

उसके हर्फो मे बात फिर क्यू है..

Sunday, August 17, 2008

कटई सभई मोहे साल बरस ॥

मधु की चाह में जीवन बीता , मधु मिला मोहे तरस तरस ॥

सुर जीवन सूख गयो भादों सा , सावन चख्या जरस जरस ॥

जीभ स्वाद जेही चखे जनत, स्वाद चढा मोहे करस करस ॥

जा चढी रंग चढाईवे मोपे , रंग रहा युही मोहे उरस उरस ....

तनवा सुख मोहे भला लगा , मनवा सुख मेरा गरस गरस ॥

आज "हकीम" जू मुरख नरवा , ज्ञान ना पायो जरस जरस ....

Saturday, August 16, 2008

सफ़र करते समय उन लोगो के लीये जो दूसरो कों यह नहीं पता चलने देते की वे कोई भजन गा रहे है .....

( एक ही "द" अक्षर से कवीता कवीता बनाई है और दुसरे इस कवीता कों गाते हुए आपके होठ नहीं मिलेगे ...)



दीन दयाल दयालु दयानिधी , दरस दिखाओ दर्शन दो ..

दीन दशा दरसु दयानिधी, दास दोहे दस दर्शन दो..

देख दुखो दिशराह दिखाए , दया दरस दर दर्शन दो ॥

दास द्वारे दुदास दिखे, दूतो दाता द्वार दर्शन दो

देख दिखाए दिनकर दाता , द्वार दीन दुखो दर्शन दो

दासगुरु दल द्वार दिखाते , दास दरस दर दर्शन दो ..





हकीम जी

Sunday, August 3, 2008

बच्चे बेचारे










जिन्हें देखकर तुम, सजाते दीवारे ।


ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे ॥

ये आंसू की धारा , ना बाती ना तैल।

ये रीते चीरागों की, खुरचन का मैल॥

ये गम की है साँसे, जमीदोज आसे

बडो से अक्लमंद, ये बच्चे ज़रा से ।

आँखों का मंजर , बुझी आग जैसे ,

ये खाली से चूल्हे ,जले आग कैसे,

समंदर में मिलते, बने झाग जैसे ,

बने तन पे नासूर,से दाग जैसे ,,

ये नूर-ऐ-अमावश, अँधेरा ये काला ।

जिन्हें ढूँढता ही ,नही है उजाला ,,

ये आंसू शर्म के , गरीबी ने फेंके ॥

जिन्हें नाज हिंद पे, कहा वे भी देखे

ये भारत के बेटे ,और माँ के दुलारे ॥

ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे,

"हकीम" की आँखों के, है ये सितारे

जिन्हें देखकर तुम , सजाते दीवारे ,

ये आशा से धूमिल है, बच्चे बेचारे

Friday, August 1, 2008

सड़क के खाली पन्ने 
दूर तक 
निगाहों का का सफर 
और विचरण करते हुए 
हमसायो के बीच 
आस्तित्व की रक्षा को 
आतुर इंसानी सोच 
बहुत बीच के 
फासलों से 
गुजरता हुआ 
फिर आ जाता है 
परिधी के चक्कर सा काटता 
उसी बिन्दु पर 
जहा से आरम्भ हुआ था 
सोच का सफर 
शुन्य की खोज में 
रीते हुए खाली 
पन्नो पर...
माना की तेरे हाथो में

उल्फत की ये डोर है

पर दिल में तेरे कुछ है

ओर होठो पे कुछ और है

माना की तेरी दीद के

कुछ आशकार राज है

स्नेह निर्झर सा पल्लवित

पल स्पन्दन चकौर है

तू गुल-ऐ-नगमा बेमजा

वस्ल -ऐ-नज़र न्याज़ है

अलख अकेर आखर

जेही प्रेम शौर है

प्राण रूप पावन धरा

वो शाम अभी दूर है

हिरदे आशा तपती धुप

दुपहरी सी और है

जीस्त-ऐ-हकीम बेवफा

पर शम्मा तजदीद है

इश्के सलासिल नूर पे

तज़लीले दीदे कोर है ..............

..गुरु कवी हकीम हरी हरण "हथौडा" हिन्दुस्तानी ..31.08..2008

Tuesday, July 29, 2008

पतझड़ और पहाड़

                                                          ---------पतझड़ और पहाड़ ----------



पत्तो से सरकता 

हुआ,

सुरलय ताल के साथ ,

सावन की रीम्झीम मे ,

गीरता हुआ पानी ,

बादलो से नही 

पहाड की चोटी से 

गिर रहा है .

सुखे पतझड पेड ,

दूर से देख रहे है ,

उस गिरते हुये पानी को ,

जो उंचा 

ओर घना उंचा 

होता जा रहा है ,

मरूभूमी के 

विषेले हाथो से 

बचने के लीये .........
---स्त्री बोध-----

जीवन पथ के
लम्बे गुजरते रास्तो पर,
एक बार नही 
अनेको बार 
मुझे 
अपने  बोध का 
अहसास हुआ है.. 
पिता की 
गोद से लेकर ,
मा के आन्चल तक .
गाव की गली से लेकर,
शहर की चोडी 
सडक तक.
इस बोध के विष  को 
ना जाने कीतनी ही बार 
पीना पडा है,
फिर भी इसका भार ,
मेरे व्यक्तीत्व को 
नही दबा पाया है ,
क्यु की मैने तो
उसको  हमेशा ,
हर बार काठ की तरह,
इसके  उपर  ही 
तैरता पाया है ..............................................30.08.2008

Monday, July 28, 2008

चाह

घनी काली स्याह 
पगडन्डी पर 
उजली नीगाहो के 
बीच मे,
आती हुई 
वे अलसाई तस्वीरे
मन के कीसी कोने मे 
दूर तक 
पीडा की अनुभूति
छोड ही जाती है ..
स्याह सफेद पन्नो पर
ओर वक्त के 
स्तनो पर
खून की परते
वर्सो से जमा 
हो रही है
खून के सर से 
आदमी बार बार 
मुह फाडता है 
मस्तिष्क का 
अन्छुआ द्वार
जहा ग्यान व प्रकाश का 
प्रवेश निषेध हे 
अज ये चौराहे पर 
नीलामी मे बिकता है 
सलवट धारी 
बीस्तर पर सीकता है
गहरी घाटी के 
अथाह अन्धकार मे 
टुटी हुई वो 
पत्थर सी तस्वीरे
भविष्य के गर्त मे 
भागती चली जाती है 
केवल ओर केवल 
जीने भर की 
चाह के लीये...

गुरु

गुरु गोविन्द सिह रई बनाईगे 

मो काठ पडो तपे नीर पवनवा

धकी धकी धोकनी गुरु सीखायेगे

शेष तभु जनो शीश झुकईवा

हाड मास खगऊ सा नरवा

सुती सुती मोहे सुधा चमनवा 

तीरे खाड रहो जकु ताकु

तार दीयो मोहे आज जनमवा

निर आखर निरगयान रहु जस

जड्मती तारी स्वाती रचुऊवा

बार जन्म लख काड खलईवा

कबहू "हकीम" ना तार जनमवा..............


29.07.2008...गुरु कवी हकीम हरीहरण हथोडा..

हकीम का रहस्यवाद

मै बनु  मन के बीच कटोरा ....

जग सात समन्द बसोरा, ये राज कमल यु ही भोरा

ना गात ना माटी गोरा, अलसेई मनु जन धोरा 

चीरवानी अन्ग कसोरा, ना गात बागीसा धोरा

यह सब हू बिछोवा मोरा, डसे काल सुपारी चोरा 

नीकसो भागो ये झझोरा,रुई लिपट अग्न की तोरा

ले "हकीम" तु बाती डोरा, उजला कपडा सीये मोरा....

Sunday, July 27, 2008

घुन लगी परवाह

कवी बी.एस. चरण बेकस...हिन्दी काव्य जगत की एक नई शान.. 



वो कल मुझसे कह कर गया कि तुम

मेरी परवाह करती हो,
मेरी चाह करती हो,

रहमत तेरी है ,
किस्मत मेरी है,

कि तुम मेरी चाह करती हो,
मेरी परवाह करती हो,

बरसो पहले,
मेले में अकेले में,
हम भी तुझे याद करते थे,
दिल में घर बनाते थे,
उसमे तुझे बुलाते थे,
और तुम आते थे,

तब में औरों से कहता था,
की,
तुम, मेरी चाह करते थे,
मेरी परवाह करते थे,

अब तुम शीशे के महल में रहते हो,
और खुद को तनहा कहते हो,
अब ये दिल रोता है,
घर भी खाली है,
क्यूंकि,
तुमने बस्ती कहीं दूर बसाली है,

और औरों से कहते हो कि ,

मेरी चाह करते हो,
मेरी परवाह करते हो,

ये रहमत तेरी है,
और किस्मत मेरी है ,

कि तुम मेरी चाह करते हो,
मेरी परवाह करते हो.......BS Charan Bekas