Friday, August 29, 2008

किसी का साथ नीगाहों में बस गया जब भी
दराज हों के पनाहों में बस गया जब भी

हज़ार झोके उलझते है मुख्तसर बन के
बहार हों के हवाओं में बस गया जब भी

क्यू हमसे पूछे जमाने में रहगुजर तेरी
एजाज़ हों के ज़माने में बस गया जब भी

आमादा हूँ अब सफ़र सुकूँ-ए-राहो में
पयामे हुशन सजाने में बस गया जब भी

कही चिराग से खैरामे जख्म जलता है
हुस्न-ओ-इश्क़ मनाने में बस गया भी

"हकीम" नश्तर निगाह -ए- इश्क आज चुभे
आशना हों के तरानो में बस गया जब भी

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