जीवन पथ के
लम्बे गुजरते रास्तो पर,
एक बार नही
अनेको बार
मुझे अपने बोध का
अहसास हुआ है..
पिता की
गोद से लेकर ,
मा के आन्चल तक .
गाव की गली से लेकर,
शहर की चोडी
सडक तक.
इस बोध के विष को
ना जाने कीतनी ही बार
पीना पडा है,
फिर भी इसका भार ,
मेरे व्यक्तीत्व को
नही दबा पाया है ,
क्यु की मैने तो
शहर की चोडी
सडक तक.
इस बोध के विष को
ना जाने कीतनी ही बार
पीना पडा है,
फिर भी इसका भार ,
मेरे व्यक्तीत्व को
नही दबा पाया है ,
क्यु की मैने तो
उसको हमेशा ,
हर बार काठ की तरह,
इसके उपर ही
तैरता पाया है ..............................................30.08.2008
हर बार काठ की तरह,
इसके उपर ही
तैरता पाया है ..............................................30.08.2008
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