Tuesday, July 29, 2008

---स्त्री बोध-----

जीवन पथ के
लम्बे गुजरते रास्तो पर,
एक बार नही 
अनेको बार 
मुझे 
अपने  बोध का 
अहसास हुआ है.. 
पिता की 
गोद से लेकर ,
मा के आन्चल तक .
गाव की गली से लेकर,
शहर की चोडी 
सडक तक.
इस बोध के विष  को 
ना जाने कीतनी ही बार 
पीना पडा है,
फिर भी इसका भार ,
मेरे व्यक्तीत्व को 
नही दबा पाया है ,
क्यु की मैने तो
उसको  हमेशा ,
हर बार काठ की तरह,
इसके  उपर  ही 
तैरता पाया है ..............................................30.08.2008

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