Sunday, June 29, 2008

दील की कोई अभीलाषा

शूल हों तुम या शब्द प्यार के
या दील की कोई अभीलाषा ,
नाज़ुक सा अहसास फूल का ,
दे गया मुझको आशा ...
इस चमन में यहाँ
हर कली रच रही
साथ में जो खीली
खुशबु सी रही बस रही
जो ना सूखे, ना मुरझाये
इतराए हर कली .....शूल हों तुम या शब्द प्यार के
हर कली सोचती
कोई चाहे मुझे
घेर ले बाहों में
उसकी बाहे मुझे
धीरे से चुपके से
कोई मन में आ बसे...शूल हों तुम या शब्द प्यार के
बाग्बा में यु ही
मेरा मन खो गया
एक कली के लीये
दील फीदा हों गया
हसरत से जो देखे
और दील में मुस्कराए ...शूल हों तुम या शब्द प्यार के
छू लीया बांकपन
वो कली डर गई
एक मीठी सीहरण
तन बदन भर गई
शर्माए ,सकुचाये
होठो से हंस पडी ...शूल हों तुम या शब्द प्यार के

(रमेश राज आनंद .......गुरु कवी हकीम हरी हरण " हथौडा" ... २९ जून, २००८)

बन्नों


मेरी बन्नों सजा ये तेरा रूप है....
तेरे मन में सजनवा की धुप है ...
तेरी आँखों के कोनो में संगीत है ..
तेरे दील में पीया जी का गीत है ...
तेरी आँखों की भाषा मैंने पढी है ...
जो खुमारी सजनवा की चढी है ...
मन दर्पण बना तेरी आश है..
और उसमे रचा ये स्वरूप है ...
तुझे जाना पीया जी के देश में
ख़त भेजे नीगाहों के भेष में
बन्नो तुझको हमारी ये दुआ है
रहे खुश तू पीया जी के देश में...
"हकीम" यहाँ खुशीयाँ अनेक है
पीया मीलन की बेला पर अनूप है .............

Saturday, June 28, 2008

रहगुजर

मेरे सुने दील कों आश है
जो सदा सी मेरे पास है
मेरे दील की धडकनों कों अब
उसी रहगुजर की तलाश है .........................
यु तकता रहा आँखे थकी
एक आश पुरी ना हों सकी
यु तो राह--मंजील मील गयी
पर दील में एक खलाश है ......................
फलक पे आँख खोजती
जो दील मेरे रोज़ थी
मैं चमन चमन खंगालता
वो कली जो एक ख़ास है ............................
मेरा दील अजीब जान है
मेरी खो गई पहचान है
तकदीर ने वो छीन ली
मुश्ते गुबार की जो बास है ............................
हर मुकाम से गुजर गए
ये ख्वाब जाने कीधर गए
मैं उन्ही लम्हों की तलाश में
जो दीलो की दर्दे प्यास है ......................
ऐ "हकीम" बाती बुझ गई
लौ भी ये समझ गई
वो सुहानी सुबह जा चुकी
अब कीस रहगुजर की आश है ..........

(साभार ..जंग लगे पत्थर ..रचनाकार ..रमेश राज आनंद उर्फ़ कवी हकीम हरी हरण हथोडा ..१९९४)

ये बढ़ते कदम

ये बढ़ते कदम क्यों थम से गए ,
क्या सोज़-ऐ-वफ़ा एतबार नहीं ..
तू देख हकीमी का जीग्रा ,
एक बार नहीं सौ बार सही.......................
हम सुने दील कों पढ़ते है,
और साज-ऐ-मोहब्बत गढ़ते है ,
इन सुर्ख गुलाबो की खातीर
यु फलक-ऐ-फकत हर बार युही ..............
यु हसने हसाने की खातीर ,
पैगाम-ऐ-मोहब्बत भेजा है .
रोने के लीये सारा जग है
हसने के लीये कोई यार नहीं......................
हम देख के हैरां है तुझको,
जब देख के तुम शर्माते हों,
सौ बार धड़कते सीने का
क्या तुमको अभी एतबार नहीं.............
...

Thursday, June 26, 2008

पगडंडी पर चलते चलत

....नर नीराशा का मेल ना कोई.......जीवन जैसा खेल ना कोई...



थक कर बैठ गया था जब मैं
पगडंडी पर चलते चलते
मन कों हार गया था जब मैं
अग्नीकंडी पर जलते जलते
मन व्याकुल था,
धुप कड़ी थी
पथ छाया भी
दूर खडी थी
संगी साथी
साथ ना कोई
जीसे थाम लू
हाथ ना कोई
पथ जीवन सब
छुट गया था
भाग्य मुझसे
रूठ गया था
मन सूरज सा हार गया जब
े दूर छीतीज़ ़ पर ढलते ढलते .....
फीर भी मैंने
आश ना छौडी
मन नीराशा में
सांस ना मौड़ी
नहीं मिलेगा
जीवन ऐसा
मानव रूप में
पाया जैसा
यत्न कीया
फीर मन धीक्कारा
पागल पंछी
क्यों मन ू हारा
व्यथा आई
बात सही है
पर देख कीरण
अब दूर नहीं है
मील जायेगी मंजील तेरी
पगडंडी पर चलते चलते .......( रमेश राज आनंद उर्फ़ गुरु कवी हकीम हरी हरण हथोडा ..."जंग लगे पत्थर"..1994)

Monday, June 23, 2008

अब जन्म मीले ना और

अब जन्म मीले ना और .......

तुने हीरा जन्म गवा दीया , रहा वही ढौर का ढौर ।

कोषों बीच में रहा पटा ,कबह पायो ना धन का धौर

दुग्ध वनीज का पायसा , चखो ना कण एक कौर

रतन गुरु नग जाडावा , तबहू पायी वागीशा भौर

आज "हकीम" सदाशय , बंधी अन्त्राकाय डौर .......

Sunday, June 22, 2008

तेरी आँखे


तेरी आँखे

आँखों से चले इन तीरों में, बचने की कहा गुन्जाईस है .
जब ये सब कुछ यहाँ लूट चली, अब मेरी कहा फरमाईस है ..
ये बोलती आँखे कहती है, जैसे नदीया पर्वत बहती है ...

लेकीन इन बोलती आँखों में, मेरे मन की कहा ये ख्वाईस है ....

यु पीते पीलाते है हम भी, मयखानों के उन आँगन में ....
लेकीन जो नशा इन आँखों में, बोतल में कहा गुन्जाईस है ......

Saturday, June 21, 2008

बुद्धा प्यार के नगर से
सोचे े
ऊँची से डगर पे
मेरे शब्दों का मोल
अब बच्चा है कहा ..
प्रेम टूटा टूटा सा
इंसा रूठा रूठा सा
मेरे शब्दों का खोल
अब बच्चा है यहाँ..
प्यार झूठ की परत में
न्याय लूट की गारत में
हीनसा कुत्ता सी भोके है
भेडीया रास्ता रोके है
मेरे रंग का असर
अब रचा है कहा .........
चक्षु डूबे अशुवन में
इंसा घुमे मधुबन में
धन सबसे बड़ा है
भाग्य और भगवान्
राहे रोके खडा है
पाप धोने को यहाँ
मंदीर भी बड़ा है
दास बना ये इच्छा का
और इसकी ये सजा है .....
पाप कीतने भी करू
पाव धरती पर ना धरू
दुख सबको ये देगा
क्यों की
भगवान् है साथ तो मेरा
कोई क्या कर लेगा
छतरी की उस की लीये
जुल्म हमेशा कीये
ये भाग्य का ढोल
अब सच्चा ही यहाँ है .......

Friday, June 20, 2008

रीते चीराग


रीते चीराग


उजड़ता सा बचपन
ये टूटे से फूल
भूखी है आशा
है कीस्की ये भूल .
आशा नज़र की
कयू टूटी हुई
कीश्मत है इनकी
कयू फूटी हुई
सपनो की दुनीया
कयू लूटी हुई
इंसा की हालत
जह्नूम बनी
पोछेंगा कौन
इसकी ये धुल ....................ये टूटे से फूल
ते भारत का बचपन
गरीबी के दाग

ये बाती से खाली
ये रीते चीराग
नीगाहे ै कैसी टुकुर टुकुर
लहू सने जैसे
गोमाता के खुर
जीवन है इनका
एक खाली कफ़न
सपने हुए कयू
इनके दफ़न
बाते गर मैं
इनकी करू
जीवन इनका करू मैं
बसीयत
मुझी को देती है
दुनीया नसीयत
करता "हकीम" बाते
कीस्की ये फीजुल ........................ये टूटे से फूल

कीरण तेरे नाम की ,



कीरण तेरे नाम की



मैंने माँगी कीरण तेरे नाम की ,
सूरज से आज उधार ..
गयान बढे तेरा मान बढे ,
नहीं खाना कीसी से खार .
उस कीरण से तू मांगना ,
हों सब का सुखी संसार .
भेदभाव एक रोग समझना ,
बढे आपस में प्यार
देश भूमी मेरी माँ समाना ,
हीममत दे होऊ नीछार .
कह "हकीम" कीरण अनमोला,
ये न्याय की है तलवार ........

Wednesday, June 18, 2008

मेरे आँगन का पेड़ ....




मेरे आँगन का पेड़ .....



मेरे जन्म से पहले ,
मेरे
दादा ने
एक कोमल बीज को
कठोर
धरती में गाड़कर ,
मेरे
आंगन के
इस पेड़ को उसी तरह
उगाया था

जैसे
मेरे बाप ने मुझ को ....
बुढी आँखों की नीगाहे
बचपन
की तरह
अभी
भी इसके साथ जुडी है ,,
इसकी
खोखली हों चुकी जडो
और
कम होती
जमीन का अहसास

मेरे
बच्चो को
कचोटता
रहता है ..
और
वे कह देते है
" रे दद्दा इस पेड़ को

अब
तो काट डालो "
और
उनके ये शब्द
मेरे
हर्दय में
एक
कुल्हाड़ी की भाँती
घुसे
चले जाते है....

काफीर

काफीर

चाहे मस्जीद में करू सज़दा ,
या बुतखाने में करू पूजा.
तेरी नज़र में काफीर
फीर भी रहूंगा मैं .....

सच की अनुभूती


सच की अनुभूती

झर झर झर झर झरने बहते
कल कल करती नदिया
हम आपस में लड़ते रहते
बीत गई है सदीया .........................
पर्वत कहता जंगल कहता
कहता पानी बहता
आपस की खीचा तानी में
इंसा नहीं है बढीया......................
इस इंसा की भोली शकले
बाते लम्बी चोडी
झाँकू पर जब इसके दील में
ये शैतान की पुडीया................
ये दीन हीन से घरणा करता
दान धरम को आफत
बदले की ये आग में जलता
बुनता नफरत की लडीयाँ .................
गयान कीताबी पाकर सोचे
मैं बन गया हूँ ग्यानी
पर इसा मुस्सा बुद्धा नानक
है इनका कोई सानी
लक्ष हमारा इस दुनीया में
ख़त्म हों दुःख की कडीयाँ .................


Tuesday, June 17, 2008

सड़क



- सड़क -(1990)

जानी पहचानी
कदमो को चूमे
आसमा के नीचे
बेफीकरे से घुमे
दुनीया दे धोखा
तो सडको का साया
महलो से निकला
तो इसी पे आया
लगती है ठोकर
चूमे जमी को
घुमे जहा भर
पाये हमी को
सर्दी में शुखी
बरखा में हंसती
गर्मी के मौसम में
दीन भर तपती
शीक्वे व शीकायत
ना कहती कीसी से
सबकी मंजील
मीलती इसी से ....

Monday, June 16, 2008




दम तोड़ती मान्‍यताएं ..... .......

चूल्हे से
कभी जो धुआ
निकलता था ,
आज वो आकाश
पर नहीं
धरती के बीच से
होता हुआ
पाताल में
चला जाता है .
पोपले मुंह से कभी
निकलता वो भारत,
थिरकने के लिये
आज पाव ढूँढता है .
पलकों का आँचल
जो घूंघट के नीचे
सरकता था,
आज , अपनी ही जमी पर
अपनी साख ढूँढता है .
टूटे हुए जिश्म में
तरक्की का पैबंद
लगाकर घूमता है
चश्मे के नीचे
रंगीन कांच में
आँख की रोशनी
आँखों को रोशन नहीं
रोगन कर रही है
पीत चेहरे पर
खोखली हंसी के साथ
मंदीर में राम को
क्‍लबों में जाम को
तीर्थो में भगवान् को
ढूँढता फिरता है
मस्तिष्क का ज्वार
और विचारों की आंधी
जहां हर्दे की
धारा को
सागर की जगह
वापस
पर्वतों में मोड्ती है
वहीं पर मान्‍यताएं
दम तोड़ती हैं .

मैं चमार हू..मैं पैर हू


मैं चमार हू..मैं पैर हू


जी मैं चमार हू
क्यों की मैं
महनत करता हू
भीख नहीं माँगता हू
कीसी को धोका
नहीं देता हू
कीसी की
रोटी नहीं छीनता हू
दुनीया में डर के रहता हू
सारे जुल्म सहता हू
और जो सारे जुल्म करते है
देश को प्यारे है
देश के दुलारे है
धोखा उनकी फीत्रत में है
फरेब उनकी कुदरत में है
पर वे महान है
क्यों वे चमार नहीं
मैं महान ँ होकर भी हीन ह
देश में लाचार हू
क्यों की मैं चमार हू
मेरी कवीता कौन पढेगा
देख के उनको मौन बढेगा
ठेका उनका भाषा पर
ठेकेदार है कवीता के
शब्द उन्हें मेरे लगते बेकार
जी मैं जो हू चमार

तुन्ही ने कहा
की मैं पैर हू
मैंने नहीं
चलो मान लेता हू
मैं पैर हू
ये मत भूल
मैं पैर हू
पर जीस दीन मैं
टूट जाऊँगा
धडाम गीरेगी
देह तुम्हारी
ये मत भूल
मैं पैर हू
ये मत भूल
मैं पैर हू
सदीया बीती
ढोता आया
ना जाने
कब से
रोता आया
अब भी संभल जा
नहीं तो जाल ले
जीस दीन मैं
टूट जाऊँगा
धडाम गीरेगी
देह तुम्हारी
ये मत भूल
मैं पैर हू
ये मत भूल
मैं पैर हू
*************************

स्वाती

एक बूँद स्वाती अक्षर सी



एक बूँद स्वाती अक्षर सी
मेरे प्राणों की
पहचान बनी
निज जलती बुझती पलकों में
सुरमई उज्जवल
मुस्कान बनी .......एक बूँद स्वाती अक्षर सी
संगीत स्वाती धारा सा
सौरभ पंखो पर बैठ के मैं
दृग-जल पीने को आतुर था
चंचल सपने सी आन तनी ..............एक बूँद स्वाती अक्सर सी
यहाँ बिखरे बिखरे कुंजो पे
मोती के चुम्बन खूब सजे
चंचल मन की आतुरता में
ये विदधुत सी पहचान बनी .........एक बूँद स्वाती अक्सर सी
पावन नीरज अर्चित चन्दन
सुर्भीत सा खीलता गौरव मन
लो की अंचल में जल जल कर
तबही मोती सी शान बनी ..............एक बूँद स्वाती अक्सर सी

उम्र का स्पर्श




उम्र का स्पर्श

नदी की तीव्र
धारा का स्पर्श
तटबंध के
जर्जर वर्क्ष को
हर रोज़ मीठा सा
सरसराता
मौत का अहसास
दे देता है
खोखली हों चुकी जड़े,
उस ठंडी जमीन को
बीमार आदमी की
मुठ्ठी तरह जकड़े है ,
पर पानी की धारा
हर रोज़
चपल शीकारी की भाँती
दाव लगा कर
खोखली जडो को
हर रोज़ पकडे है...............

गुरु नानक देव जी



गुरु नानक देव सहारे ,
घास पात को रहा नीहारे, फल फूल से रहा कीनारे ,,..............गुरु नानक
धन की खातीर दुनीया ठगता, ठगे नहीं वचन तीहारे ................गुरु नानक
हाड मांस खगुई सा नर्वा ,कभी पास गया ना थारे ..................गुरु नानक
जबू तोहे दील में राखन लागा ,मुझे मीले गयान के धारे ................गुरु नानक
आज "हकीम" कर्म को देखे ,मेरे गुरुआ कर्म उबारे .....................गुरु नानक

राम नाम जपा दुःख में साई,

राम नाम जपा दुःख में साई


राम नाम जपा दुःख में साई,
सुमीरण नाही सूखत में आयो, दुःख में राम बडाई .
दीन हीन से पल्लो झाडा ,रहा ठाट से मैं भाई .
सुख की बंसी अवीरण बांची, दुःख में सुमीरण आई .
दान धर्म को आफत जानी ,दुःख में बना अनुयाई
लेख करम के जभु जभु देखे, क्यों तीमीर मन घबीराई
राम जपो भगवान् जपो तुम, ये करम लेख ना जाई
राम* ़ "हकीम" हर्दय संग राखो , होत ना जग में हँसाई.

* यहाँ राम का अर्थ है मानवता ,दया ,करूणा और हर प्राणी से प्रेम करना ...ना की राजा दशरथ का पुत्र ..मेरे राम तो ऐसे है जो.............

कबीरा के हर्दय में बस्ता
रवीदासा के मन में जचता
नानक दादू सब में हंसता
जो बुद्धा इसा मुसा रचता
कहे "हकीम" उसी के वचना
बनू मैं मानव है ये सपना

मेरा गांव ....

माटी की हँडिया में
सौंधी
सौंधी वो
साग की खुशबू,
मेरी
साँसों से
आती
हुई मालूम
होती
है, छप्पर की
टप टप का वो
सुरमई
संगीत जो
वर्षा
में
हर
रोज़ बजता था और
पगडंडी
की धूल का अहसास
कितना
सच्चा था
जो
इन् धुंआ छोडती मोटरों से
तो बहुत अच्छा था ...

मेरी हार


मेरी हार



टूटी पतवार है

नाव बेकार है

पानी चढ़ने लगा

नदी भारी हुई

डूबने की सभी

तैयारी हुई

तेरी ये दूरीया

मेरी मज्बूरीया

बढ़ता ये फासला

टूटा यू होसला

मरने की तभी

यू खुमारी हुई ...डूबने की ..

मैं पशेमान सा

यू परेशान था

याद खुद को करू

या खुदा को करू

बड़ी मुश्कील से ये

बेकरारी सही .....डूबने की सभी

सोचु मैं यू भला

आई क्यू ये बला

सर फटने लगा

मन बटने लगा

फीर भी पहल ना

मन में तुम्हारी हुई ........डूबने की ...

आश अटके वहा

मन भटके यहाँ

नैन बैचेन है

दील को ना चैन है

जग हँसाई कसम से

हमारी हुई ............. डूबने ...

टूटे मन को लीये

मैंने आंसू पीये

तब ये ली थी कसम

ख़त्म सारी रषम

फीर भी मन से ना

तेरी इंतेजारी गई .......
.डूबने की सभी

मैं कीसलीये चुप ह





मैं कीसलीये चुप हू


ये मत पूछ मुझसे ,
मैं कीसलीये चुप हू
ना ही तेरी वफ़ा ,
ना जफ़ा मैं चुप हू
ना ही दुनीया या
दुनीया की बातो के लीये
ना ही तेरे ना दुनीया
के जज्बातों के लीये
फीक्र ही कीसको है
दुनिया की बातों का
जनाजा तो नीकल चुका
अरमानों की रातों का..
दर्द का प्याला जो
पी रहा चुप हूं
यही क्या कम है
जो जी रहा चुप हूं..