Friday, September 12, 2008

इस उजले पथियारे पथ से
बीच धरा के मृदुल रथ से
मुझे जन्म दो माँ
बाट सकू पथ पीडा मन की
विद्युत-छबि उर नवजीवन की
तिमिर भेद प्रकाश उबेरू
उन्‍मन पुष्‍प गति बखेरू
ज्योति ज्योति नव प्राण खीच कर
हर जीवन में अमृत सींच कर
नभ हाथो से तारे छुलू
मुझे जन्म दो माँ
रोक सकू अंधियारा सब का
बाँध सकू उर उजियारा सब का
नहीं त्रास नहीं प्यास बचे अब
क्षुब्ध, लुब्ध तूफ़ान सजे अब
रचो रक्ष शुक्ति मरूपथ से
अंत ना हों दुर्लभ परिपथ से
मुझे जन्म दो माँ
जन्म दो माँ

No comments: