हिज्र की पहली शमा दिल में असर करती है
शब समंदर की तरह तेग़-ए-सितम करती है
सहर के दम से आतिश का मजा आता है
सर-ए-महज़र की तरह बर्ग बसर करती है
बट गई साँसे यहाँ तकसीम नजर दिखती है
आने वाली जो बजू सफिरो सा सफ़र करती है
रोज़ आती है सदा पढ़ के किताबो से अता
अफ़सुर्दा बरखो में लिखी बाते असर करती है
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