छाया: रचानाएं आमंत्रित
जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स-ए-लताफ़त रोती है
वो आयेगा अब तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
मिट जायेगी राते अब काली
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब ना नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
चहू और उजाला फैलेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
बस चाँद ज़रा माध्यम नीकले .....GURU KAVI HAKIM.......
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment