Saturday, October 25, 2008

भंगुर है संसार

दर्रों के इन क़दमों में

भंगुर है संसार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार

लज्जारुण चेहरा

ये शहर नख़्लिस्तान

बनजारों देश में

नहीं होता कब्रिस्तान

दफ़न सब रश्मे यहाँ

भूखे भेड़िए सा प्यार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार

सौदा-ए-मुहब्बत की

बातो के सहारे

रोते सर पकड़ के

दुखो के सब मारे

धोखा इनकी फितरत

फरेब इनकी यारी

नकली से है चहरे

लोमड की होशयारी

तेरी इस दुनिया में

इनकी ही भरमार

तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार

चार दिन बसेरा

और बाते लम्बी चोडी

इन्सां के आँगन में

खुशिया कितनी थोड़ी

सुबह जागे खुशिया

दोपहर तक है तपती

शाम आते आते

सारी खुशिया थकती

सीने से लगाए तू

काहे ये गुब्बार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार ........गुरु कवि हकीम

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