Monday, September 8, 2008

नुकताची बढ़ती गई, दिल के तारे ना जले
अब जमाने में भला ,खुद-ब-खुद कर्ब चले

कमरी रातो का समा ,दिल का दस्तगीर बने
फिर वो मावस की सबा, नग्जे हरबार खिले

मैं फकत ताइब तेरा ,जाब्ते गम मैंने कीये
बुगज बढाता ही गया ,ना मिटे दिल के सिले

ये अजीयत सा शमा, तजल्जुल करता सहर
गमख्वारी ना मिली , फिर होके ग़मगीन चले ...


कर्ब = व्याकुलता /पीडा
कमरी = चांदनी
दस्तगीर = मददगार
मावस = काली अंधेरी रात
सबा = वक्त
नग्जे = अदभुत हालत
ताइब = बुरी आदत पर अलग रहने की प्रतिग्या करने वाला
जाब्ते गम = दुखो उजागर ना करने वाला
बुगज = मन में रखे जाने वाला बैर
अजीयत = यातना ,दुःख
तजल्जुल = कम्पन
सहर= सवेरा
गमख्वारी= सहायता
ग़मगीन= दुखो से व्याकुल

.............हकीम साहिब .......

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