Tuesday, July 29, 2008

पतझड़ और पहाड़

                                                          ---------पतझड़ और पहाड़ ----------



पत्तो से सरकता 

हुआ,

सुरलय ताल के साथ ,

सावन की रीम्झीम मे ,

गीरता हुआ पानी ,

बादलो से नही 

पहाड की चोटी से 

गिर रहा है .

सुखे पतझड पेड ,

दूर से देख रहे है ,

उस गिरते हुये पानी को ,

जो उंचा 

ओर घना उंचा 

होता जा रहा है ,

मरूभूमी के 

विषेले हाथो से 

बचने के लीये .........
---स्त्री बोध-----

जीवन पथ के
लम्बे गुजरते रास्तो पर,
एक बार नही 
अनेको बार 
मुझे 
अपने  बोध का 
अहसास हुआ है.. 
पिता की 
गोद से लेकर ,
मा के आन्चल तक .
गाव की गली से लेकर,
शहर की चोडी 
सडक तक.
इस बोध के विष  को 
ना जाने कीतनी ही बार 
पीना पडा है,
फिर भी इसका भार ,
मेरे व्यक्तीत्व को 
नही दबा पाया है ,
क्यु की मैने तो
उसको  हमेशा ,
हर बार काठ की तरह,
इसके  उपर  ही 
तैरता पाया है ..............................................30.08.2008

Monday, July 28, 2008

चाह

घनी काली स्याह 
पगडन्डी पर 
उजली नीगाहो के 
बीच मे,
आती हुई 
वे अलसाई तस्वीरे
मन के कीसी कोने मे 
दूर तक 
पीडा की अनुभूति
छोड ही जाती है ..
स्याह सफेद पन्नो पर
ओर वक्त के 
स्तनो पर
खून की परते
वर्सो से जमा 
हो रही है
खून के सर से 
आदमी बार बार 
मुह फाडता है 
मस्तिष्क का 
अन्छुआ द्वार
जहा ग्यान व प्रकाश का 
प्रवेश निषेध हे 
अज ये चौराहे पर 
नीलामी मे बिकता है 
सलवट धारी 
बीस्तर पर सीकता है
गहरी घाटी के 
अथाह अन्धकार मे 
टुटी हुई वो 
पत्थर सी तस्वीरे
भविष्य के गर्त मे 
भागती चली जाती है 
केवल ओर केवल 
जीने भर की 
चाह के लीये...

गुरु

गुरु गोविन्द सिह रई बनाईगे 

मो काठ पडो तपे नीर पवनवा

धकी धकी धोकनी गुरु सीखायेगे

शेष तभु जनो शीश झुकईवा

हाड मास खगऊ सा नरवा

सुती सुती मोहे सुधा चमनवा 

तीरे खाड रहो जकु ताकु

तार दीयो मोहे आज जनमवा

निर आखर निरगयान रहु जस

जड्मती तारी स्वाती रचुऊवा

बार जन्म लख काड खलईवा

कबहू "हकीम" ना तार जनमवा..............


29.07.2008...गुरु कवी हकीम हरीहरण हथोडा..

हकीम का रहस्यवाद

मै बनु  मन के बीच कटोरा ....

जग सात समन्द बसोरा, ये राज कमल यु ही भोरा

ना गात ना माटी गोरा, अलसेई मनु जन धोरा 

चीरवानी अन्ग कसोरा, ना गात बागीसा धोरा

यह सब हू बिछोवा मोरा, डसे काल सुपारी चोरा 

नीकसो भागो ये झझोरा,रुई लिपट अग्न की तोरा

ले "हकीम" तु बाती डोरा, उजला कपडा सीये मोरा....

Sunday, July 27, 2008

घुन लगी परवाह

कवी बी.एस. चरण बेकस...हिन्दी काव्य जगत की एक नई शान.. 



वो कल मुझसे कह कर गया कि तुम

मेरी परवाह करती हो,
मेरी चाह करती हो,

रहमत तेरी है ,
किस्मत मेरी है,

कि तुम मेरी चाह करती हो,
मेरी परवाह करती हो,

बरसो पहले,
मेले में अकेले में,
हम भी तुझे याद करते थे,
दिल में घर बनाते थे,
उसमे तुझे बुलाते थे,
और तुम आते थे,

तब में औरों से कहता था,
की,
तुम, मेरी चाह करते थे,
मेरी परवाह करते थे,

अब तुम शीशे के महल में रहते हो,
और खुद को तनहा कहते हो,
अब ये दिल रोता है,
घर भी खाली है,
क्यूंकि,
तुमने बस्ती कहीं दूर बसाली है,

और औरों से कहते हो कि ,

मेरी चाह करते हो,
मेरी परवाह करते हो,

ये रहमत तेरी है,
और किस्मत मेरी है ,

कि तुम मेरी चाह करते हो,
मेरी परवाह करते हो.......BS Charan Bekas

तलाश


श्रद्धा जैन..सिंगापुर,

हिन्दी काव्य जगत पर नारी मन ,भाव ओर शब्दो के अद्भुत हस्ताक्षर. मन के बहुत करीब से नीकलती हुई इनकी कविता  अपने भाव ओर अहसास को ह्रदय
 के पास छोड जाती है.. इनका जन्म विदिशा मे हुआ जो मध्यप्रदेश में भोपाल के पास एक बहुत छोटा सा शहर है ..केमिस्ट्री में अपनी शिक्षा पूरी की 
और आजकल यहाँ अंतर राष्ट्रीय विद्यालय में हिन्दी भाषा को सब तक पहुँचा रही है...

तलाश.........

जिसकी तलाश मुझे भटकाती रही, 
चाह में खुद को जलाती रही 
वो सुख तो कभी था ही नहीं 

बेसबब उन पथरीली राहों पर चलकर 
खुद को ज़ख़्मी बनाती रही, 
कभी गिरती कभी सम्हल जाती 
सम्हल कर चलती तो कभी लड़खड़ाती 
लड़खड़ाते कदमो को देख लोग मुस्कराते 
कोई कहता शराबी तो कई पागल बुलाते 
पर कोई न होता जो मुझे सम्हाल पाता 
गिरे देखकर अपना हाथ बढ़ाता 
जिसकी तलाश में खुद को गिराती रही 
वो सुख तो कभी था ही नहीं 

अधूरे एहसास के साथ मैं चलती रही, 
मिलन की आस लिए कल – कल बहती रही 
कभी किसी झील, तो कभी नहर से मिली , 
कभी झरने में मिलकर संग संग गिरी 
मिला न वो , जो मुझमे मिलकर मुझे संवारे 
मेरे रूप का श्रगार कर इसे और निखारे 
जिसके लिए अपने वजूद को मिटाती रही 
वो सुख तो कभी था ही नहीं................
श्रद्धा जैन.

Thursday, July 24, 2008

वो रूसियाही आज इन फीजाओ मे

ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है



कल चीरागो मे तैल हमने भरा

अब ये काली सी रात फिर क्यू है



नींद पर आज लहु के छींटे

मुबागाचो मे साथ फिर क्यू है



तु तसल्ली मे सबसे पुछा फीरा

मेरे हाथ मे हाथ
फिर क्यू है



कल किसी बात पर मोहल्ला फूंका

आज मेरे घर ये जमात फिर क्यू है



वो मरा ईक "हकीम" हमले मे

उसके हर्फो मे बात फिर क्यू है..




 

वो हसे इस भरी दुपहरी मे 
वल्ला कुछ है जो दील खुमारी है 

कोई हसता यू नही आन्खो से
अल्ला कुछ बात से शियारी है

सुर्ख कपडो से ना कमतर कुन्दन
यु तो भादो की धूप सारी है 

वो गजल बन के चल पडे कब से 
रूह खामोश सी हमारी है 

ये सफेदी जो दीख रही सर पर
कुछ तो ये धूप की ही मारी है 

कुछ तो हम आज हकीमी से गिरे 
कुछ 
"हथौडा" भी हम पे भारी

नीन्द आती ही नही

नीन्द आती ही नही 

दील का सकु रोता है 

बन्द कमरो मे ,

मेरे साथ 

बजु सोता है...

कोन कह्ता है मुझे 

उसका शवर होता है 

बन्द खिड्की मे 

मेरे रोज बसर खोता है ...............

ये फीजा और मक्क्नुत-ए-खुदा 

याद नही 

रोज आती है खबर 

रोज जुदा होता है....


मै तब्बवूत मे गीरा 

जाहील पे

दील-ए-नादा -ए-हकीमी मे 

खुदा रोता है.................hakeem.............

Saturday, July 5, 2008

इब्तीदा -ऐ-इश्क

बस एक सुराग-ऐ-ख्वाब में मीसल-ऐ-चीराग नूर है .
इब्तीदा -ऐ-इश्क सा सफ़र,नीशान-ऐ इश्क दूर है
हक़ ना मीला है हीज्र में, दर्द मीन्नतकश जरुर है
ये लब खुले "हकीम के ,हकीकत-ऐ-ससब सरुर है .......

Friday, July 4, 2008

जन्म दीन मुबारक

जन्म दीन मुबारक.....

जन्म दीन मुबारक
खुशी यु ही छाये
तेरी जींदगी में
ये दीन रोज़ आये
तू बाटे इन खुशीयों को ,
मैं गाऊ तराना
बने दील में तेरे भी
मेरा ठीकाना
ये दुनीया की दहशत
तुझे छू ना पाए
खुशी हर जहां की
तेरे पास आये
तू दहशत मिटाये
तू जन्नत रचाए
तू ख्शीया बढाए
तू रहमत लुटाये
सीतारो से आगे
तू यु रोज़ भागे
सबके दीलो कों
जगाये और जागे
तुझे हों मुबारक
ये दीन मेरे यारा
यु हंसता रहे
बने सबका प्यारा
इलाही मोहब्बत
तेरे मन कों भाये
करूंगी खुदा से
मैं ये ही दुआए
अश्क-ए-नदामत
क़यामत ना आये
जन्म दीन मुबारक
खुशी यु ही छाये

आवाज़: संगीत दिलों का उत्सव है - संगीत के नए सत्र की पहली सौगात

आवाज़: संगीत दिलों का उत्सव है - संगीत के नए सत्र की पहली सौगात

suro kee ye duneeyaa ,
suro se hai naataa
bhaa gaye re tere sur
kasam se dil me hamaare
chha gaye re tere bol
sach me man me hamaare ...

bahut sundar paryaas..
jahaa bastee hai aash ....

दुमीया कड़वा नीम

यहाँ क्यों आया रे हकीम
तू क्यों आया रे हकीम
ये दुनीया कड़वा नीम ,
यहाँ दुखो के अंबर भीम,
हुई खुशीयाँ सब तकसीम,
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम
जले दील के दर्द का प्याला
ना तैल ना बाती ज्वाला
तारीक आसमान काला
हुई जुल्म से दुनीया मुकीम
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम.....................
नहीं होता लीबास-ऐ मजाज
यहाँ ढूँढू जबीन-ए-नीयाज
इबीतीदा -ऐ-इश्क है रोता,
छाती पर साँप है सोता.
हर तल्ख़ शह गममीम
भूला सब मैं बस्रीम
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम
उल्टी गंगा यहाँ बहती
हर जुल्म कों दुनीया सहती
ये अजब है दौर कहानी
होसाब की सी जीन्द्गानी
ये फकत-ऐ ककीर-ऐ-ख्वाबे
गई सय्याद से चीड़ीया जीम...
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम.................

Tuesday, July 1, 2008

कुछ अशीयार

धुँआ धुँआ है जींद्गी रास्ते अजीब से
दूर फीर भी है मेरे बैठा जो करीब से...

***
आंसू ना होय कोई ना कोई सीतम की बाते
बेफीर सी हंसी हों जन्नत सा हों आशियाना
मेरे दील के पास बैठे करे गुफ्तगू सुहाना
जीसे खाके ना मरू मैं वो जहर कहा से लाऊ
सुन्दर धरा पे ऐसा वो शहर कहा से लाऊ

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मोह्बात उम्र क्या देखे मोहब्बत दील कों चाहती है
शक्ल दो चार दीन की है मोहब्बत मन कों चाहती है