यहाँ व्याकुल से
शब्द खड़े है
परिधानों में
शब्द जड़े है
मेरे इन शब्दों में
तुम हों
मेरी इन आँखों में
तुम हों
जीन शब्दों से
साँसे पिघले
मेरी उन साँसों में
तुम हों
अपने शब्द ,
मै गाऊ कैसे
तार है टुटे
मन के ऐसे
एक नही दस
ओर खडे है
कीसको मारु
पास बढे है
गलत बने सब
गोरख धन्दे
गान्ठ के पुरे
आन्ख के अन्धे
यहा ........
बढता ही जाये सन्ग्राम .........
कसम से हम....
रह जाते है दिल थाम ..
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