संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप
उस पार समंदर पर्वत है
इस पार नदी का खुला रूप
इंसा बटता खुशिया रोती
और भूख में है भाषा सोती
जहा मौत नाचती दौराहे
ले हाथो में पत्थर स्वरुप
संसार जगत एक अंध कूप
संसार जगत एक खिली धूप .....
ये लोक गतानुगति का है
सबकी विस्मृत सहमति का है
अलसित जीवन की धारा पर
यहाँ टूट रहे शिथिल कुरूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप ......
संसार सोच एक दर्पण है
प्राणों के भीतर अर्पण है
करुणा पिसती अंधियारे है
अवसादों के आँगन सारे है
यहाँ रोज़ सुलगती साँसों में
जीवन रचता अनुप्रीत अनूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप .....guru kavi hakim
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