माना की तेरे हाथो में
उल्फत की ये डोर है
पर दिल में तेरे कुछ है
ओर होठो पे कुछ और है
माना की तेरी दीद के
कुछ आशकार राज है
स्नेह निर्झर सा पल्लवित
पल स्पन्दन चकौर है
तू गुल-ऐ-नगमा बेमजा
वस्ल -ऐ-नज़र न्याज़ है
अलख अकेर आखर
जेही प्रेम शौर है
प्राण रूप पावन धरा
वो शाम अभी दूर है
हिरदे आशा तपती धुप
दुपहरी सी और है
जीस्त-ऐ-हकीम बेवफा
पर शम्मा तजदीद है
इश्के सलासिल नूर पे
तज़लीले दीदे कोर है ..............
..गुरु कवी हकीम हरी हरण "हथौडा" हिन्दुस्तानी ..31.08..2008
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