Friday, August 1, 2008

माना की तेरे हाथो में

उल्फत की ये डोर है

पर दिल में तेरे कुछ है

ओर होठो पे कुछ और है

माना की तेरी दीद के

कुछ आशकार राज है

स्नेह निर्झर सा पल्लवित

पल स्पन्दन चकौर है

तू गुल-ऐ-नगमा बेमजा

वस्ल -ऐ-नज़र न्याज़ है

अलख अकेर आखर

जेही प्रेम शौर है

प्राण रूप पावन धरा

वो शाम अभी दूर है

हिरदे आशा तपती धुप

दुपहरी सी और है

जीस्त-ऐ-हकीम बेवफा

पर शम्मा तजदीद है

इश्के सलासिल नूर पे

तज़लीले दीदे कोर है ..............

..गुरु कवी हकीम हरी हरण "हथौडा" हिन्दुस्तानी ..31.08..2008

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