मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में ,
सपने पुलकित हरीतिमा ,
तेरे प्यार में
पथ पथ पे बिखरा
सुनहरा सा रूप ,
मधु मरन्द भर कर
खिली जैसी धूप .
सिर्फ एक शब्द है ,
विरहाकुल सी हद है .
विषय वश हुआ मैं ,
अधर चूम कर ,
कुमुद दल पे भंवरे
सकल घूम कर ,
मन के सीते है धाँगे
तेरे प्यार में
मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में .......
ये द्रवित प्राणों का
भय अब नहीं
ह्रदय के भीतर
भ्रम अब नहीं
साँसे बिखरी थी
जो मेरे कल
आलिंगन करती है
वो पल पल,
छूकर जीवन की
मुरली की धुन
सजल- स्वर्ण
सपने बुने प्रतिपल,
मैं रीते ह्रदय का
बनू मुक्त बंधन
तेरे प्यार में .....
मन बांधे ,बंधू मैं
तेरे प्यार में ......... Guru Kavi Hakim.......
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