प्रबल वेग की धारा सा
मन संताप बढ़ा मन में
मानवता के इस क्रंदन पर
शापित आक्रोश जगा जन में
काली अंधियारी रातो का द्वेष
उर उजियारे में फैलाता क्लेश
नफ़रत का ये घौर अँधेरा
ना तेरा है ना ही मेरा
कब जागे बुद्धा की बाते
ह्रदय बीच उनके कण कण में ......
मौत बाटते काले बादल
मृत्यु नाच आँगन में वसुधा के करते
पावन अमृत में अनीति का विषपान है भरते
फूँक रहे पेडो की धरती
आग बुझेगी कब ये वन में .......
कौन बचेगा ज्वाल लहर से
कौन जियेगा व्यथा जहर से
जिन पत्तो से आँगन रचते
कौन बिंधेगा रूद्र कहर से
व्याकुल हूँ इस छल पीडा से
व्याकुल हूँ इस मिथ्या से
उमड़-उमड़ कर सपने छलते
स्पन्दन करते उन्मन में.......
----------कवि हकीम ------------
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