Saturday, September 13, 2008

प्रबल वेग की धारा सा
मन संताप बढ़ा मन में
मानवता के इस क्रंदन पर
शापित आक्रोश जगा जन में
काली अंधियारी रातो का द्वेष
उर उजियारे में फैलाता क्‍लेश
नफ़रत का ये घौर अँधेरा
ना तेरा है ना ही मेरा
कब जागे बुद्धा की बाते
ह्रदय बीच उनके कण कण में ......
मौत बाटते काले बादल
मृत्‍यु नाच आँगन में वसुधा के करते
पावन अमृत में अनीति का विषपान है भरते
फूँक रहे पेडो की धरती
आग बुझेगी कब ये वन में .......
कौन बचेगा ज्वाल लहर से
कौन जियेगा व्यथा जहर से
जिन पत्तो से आँगन रचते
कौन बिंधेगा रूद्र कहर से
व्याकुल हूँ इस छल पीडा से
व्याकुल हूँ इस मिथ्या से
उमड़-उमड़ कर सपने छलते
स्पन्दन करते उन्मन में.......

----------कवि हकीम ------------

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