ये मंजर ....
ये मंजर दिल जलाता है इन्तेबा है बहुत बाकी
अभी से हाल बर्गे -ऐ- दिल, अभी मंजिल बहुत बाकी ॥
बताते हों जो हिचकियों से हमारा राज राह दहरे
सितम सीने में गाफिल है ,अभी बाते बहुत बाकी
तवक्को तुम नहीं करते , शिकायत आज सारी है
स्याह रातो से तुम डरते , अभी राते बहुत बाकी
सब-ऐ-गम की ये शायारी परेशाँ आज हम भी है
रहो परदों में तुम हज़रत ,हजाते है बहुत बाकी
नही फिकरे गम -ऐ--मंजिल मैं डरता हूँ हिकारत से
वस्ल रख अब हयाते तुम , तिजारत अब नही बाकी ....
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