Tuesday, September 2, 2008

ये मंजर ....


ये मंजर दिल जलाता है इन्तेबा है बहुत बाकी
अभी से हाल बर्गे -ऐ- दिल, अभी मंजिल बहुत बाकी ॥


बताते हों जो हिचकियों से हमारा राज राह दहरे
सितम सीने में गाफिल है ,अभी बाते बहुत बाकी

तवक्को तुम नहीं करते , शिकायत आज सारी है
स्याह रातो से तुम डरते , अभी राते बहुत बाकी

सब-ऐ-गम की ये शायारी परेशाँ आज हम भी है
रहो परदों में तुम हज़रत ,हजाते है बहुत बाकी

नही फिकरे गम -ऐ--मंजिल मैं डरता हूँ हिकारत से
वस्ल रख अब हयाते तुम , तिजारत अब नही बाकी ....

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