Tuesday, October 28, 2008

हम ख्वाब देखते दर्पण में........

हम ख्वाब देखते दर्पण में

ख्वाबो के पूर्जे जोड़ रहे

एक बूँद जहर सा प्याले में

शीशे में दर्पण तोड़ रहे

यहाँ लहू में लथ पथ सीने है

जानिब थक बैठे पीने है

पीते पीते इन शीशो में

हम अक्श तुम्हारा छोड़ रहे ......

गम जब्ज किया है फूलो सा

नश्तर चुभता एक शूलो सा

एक सफ़र ताब जिंदगानी कों

दश्ते उल्फत में मोड़ रहे .....

हर अश्क में खुशीयाँ रोती है

आँखों में हसरत सोती है

ये जुर्म-ए-मौहब्बत है साकी

टूटा इकरार रहा बाकी

खाली हर्फो के पन्नो पर

रीते शब्दों कों जोड़ रहे ...... ........गुरु कवि हकीम

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