Tuesday, October 28, 2008

प्राणों से

बढ़कर प्रीत हुई

सोई साँसे संगीत हुई

मन ठहर गया

हिहर गया

सपनों सी मेरी जीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

ठहर ठहर मैं इतराता

समय पकड़ कर कर झुठलाता

जग दोष मेरा बेमोल हुआ

शब्दों में वो अनमोल हुआ

सपने जागे

मेरा मन भागे

रोती साँसे भी गीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

जीवन की धारा हसरत थी

रुकने की कीसको फुरसत थी

मुट्ठी भर सपने पाने कों

चुटकी भर जीवन जीने कों

अलसाई इन पलकों में

उलटी धारा भी रीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा

किरणों में अंकीत सी रेखा

पथ परिचित में आगे बढ़ता

तारो के बादल में चढ़ता

मन आलोक गगन कों छूकर

अभिलाषा के अंत के ऊपर

पल-भर परिचित मनमीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

हम ख्वाब देखते दर्पण में........

हम ख्वाब देखते दर्पण में

ख्वाबो के पूर्जे जोड़ रहे

एक बूँद जहर सा प्याले में

शीशे में दर्पण तोड़ रहे

यहाँ लहू में लथ पथ सीने है

जानिब थक बैठे पीने है

पीते पीते इन शीशो में

हम अक्श तुम्हारा छोड़ रहे ......

गम जब्ज किया है फूलो सा

नश्तर चुभता एक शूलो सा

एक सफ़र ताब जिंदगानी कों

दश्ते उल्फत में मोड़ रहे .....

हर अश्क में खुशीयाँ रोती है

आँखों में हसरत सोती है

ये जुर्म-ए-मौहब्बत है साकी

टूटा इकरार रहा बाकी

खाली हर्फो के पन्नो पर

रीते शब्दों कों जोड़ रहे ...... ........गुरु कवि हकीम

Saturday, October 25, 2008

भंगुर है संसार

दर्रों के इन क़दमों में

भंगुर है संसार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार

लज्जारुण चेहरा

ये शहर नख़्लिस्तान

बनजारों देश में

नहीं होता कब्रिस्तान

दफ़न सब रश्मे यहाँ

भूखे भेड़िए सा प्यार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार

सौदा-ए-मुहब्बत की

बातो के सहारे

रोते सर पकड़ के

दुखो के सब मारे

धोखा इनकी फितरत

फरेब इनकी यारी

नकली से है चहरे

लोमड की होशयारी

तेरी इस दुनिया में

इनकी ही भरमार

तेरी इस दुनिया में
रखा क्या है यार

चार दिन बसेरा

और बाते लम्बी चोडी

इन्सां के आँगन में

खुशिया कितनी थोड़ी

सुबह जागे खुशिया

दोपहर तक है तपती

शाम आते आते

सारी खुशिया थकती

सीने से लगाए तू

काहे ये गुब्बार

तेरी इस दुनिया में

रखा क्या है यार ........गुरु कवि हकीम

Wednesday, October 22, 2008

मन डोर............

कण-कण लौ जगी उससे
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
चुपके से पदचाप
जवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....................





गुरु कवि हाकीम.........................


...............

Tuesday, October 21, 2008

अशकारो में जलते है अब
ईमान की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही......
खुशिया लूटती दहशत बढ़ती
हर सोच यहाँ मरकज चढ़ती
नफ़रत ने मोहब्बत को घूरा
शैतान की नियत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही .......
तम्हीद-ए-सितम तासीर यहाँ
ख़ुद ही होश गवा बैठे
होश-ए-ख़िल्वत हुई रुखसत
नजर--सय्याद जवां बैठे
सौदाइयो की बस्ती में
सामान की कीमत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........
रहबर छूटते दामन बटते
ख़ुदनिगरी की अंगड़ाई है
मुश्किल आलम रूश्वाई का
झुर्मुट की ये गहराई है
सरमायो का ये मन्दिर है
बैठी सूरत एक भोली सी
सरमायो के इस मन्दिर में
भावान की सूरत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही..........
एकाकीपन में जीते है
कशिश-ओ-जज़्ब की बात कहा
मायूसी की इस नगरी में
ख़ामोश फ़ज़ाओं सी रात यहाँ
तासीर तसव्वुर चूर हुए
टकरा ही हम टूट गए
टूटा मोटी बिखरी माला
जख्म यहाँ नासूर हुए
हर चीज में मिलती सैय्यारी
नेकी की हालत ठीक नही
गर्द भरी इन राहो पर
इंसान की हालत ठीक नही...........


चाँद ज़रा माध्यम नीकले...

जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स--लताफ़त रोती है
वो आयेगा तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
पा जाए मुरादे शायद तू
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले
जब चाँद तेरा माध्यम नीकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
कोई मन के तार झंझोरेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम नीकले

दो पैसो में इंसान बिके ....

सैय्याद की दौलत बिखरी है
इस दौलत में हर शान बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....
ईमान बिके बे-ईमान बिके
यहाँ देश धर्म की शान बिके
उजले बिकते काले बिकते
मंदीर बिकते मस्जिद बिकते
पुरपेंच जमाने में सारे
रहबर के सब भगवान् बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके .....
धन बल की माया जारी है
बिकती हुई तन से नारी है
अधखिली ज़र्द सी कलियों में
सौदायो की भारमारी है
नीलामघरो के जीनो में
माँ बहनों की यहाँ आन बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....... ......guru kavi kahim......

तस्व्वुर वफ़ा....

तस्व्वुर वफ़ा एक पशेमान सी
मेरे शब्दों में है वो कहानी बहुत
जि़न्दगानी बादा सागर है जवां
मेरे शब्दों में है वो जवानी बहुत
इन्तेज़ा बेकरारी तवज्ज़ुन बढे
मेरी धड़कन है मैं वो रवानी बहुत
बीक चुके दिल के अरमान कई मोड़ पर
रास्ते की डगर है सुहानी बहुत
ये मोहब्बत के नग्मे मुतिरब से है
दुनिया है इनकी दीवानी बहुत
फकत उम्र अब तो फना हों चुकी
मेरे शब्दों में अब भी जवानी बहुत...
अभी छोड़ ना दिल के नग्मे 'हकीम'
हयात-ऐ-वफ़ा जिंदगानी बहुत

पीना छोड दो ......

दुनिया कहती है कि पीना छोड दो
ये क्यू नहीं कहती की जीना छोड दो
नुमाया जिन्दगी की तल्खिया लिए
जवां सीने में धड़कने जोड दो
मिज़ाज-ए-अजिजि हमें क्या पता
कोई आके मेरे दिल में वो छोड़ दो
भीगी पलको से हम आज रोते रहे
दरगाय-ऐ-मोहब्बत कोई मोड़ दो
सोचता हूँ बसर घर कोई मैं करू
पेश-ऐ-नश्तर जिगर अब कोई तोड़ दो
गिराँबार तेरी नजर का सिला
तसव्वुर में आके शम्मा छोड़ दो
यख़बस्ता उदासी है दिल में "हकीम"
शुआ जीस्त कोई मुझे मोड़ दो ...

Friday, October 17, 2008

युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये

युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये

फकत हर जख्मो कों चहरे का आईना ना कहो
कहानी मेरी दर्द-ए-मोहब्बत की दास्ताँ ना कहो

कफस की स्याही रोकती है हवा-ए-शौक़ की कुव्वत
महसूस होती जिन्दगी कों खालिस रोशनाई ना कहो

दोस्त के हाथो ने उठा रखी है आज दुश्मन की तलवार
हमने तो गले लगाया है जयचंदों कों उसे गद्दार ना कहो

निगाह-ए-जमाल में हमारे ऐबो कों गिनाओ जमाने भर में
मगर हमारी अक्स-ए-सोज़-ए-दिल के सामने बुरा ना कहो

मिज़ाज-ए-आजिजी ना दे सको तो कोई बात नहीं "हकीम"
इन नकली चेहरों के आइनों में माहौल अह्द-ए- वफ़ा ना कहो ..

छाया: रचानाएं आमंत्रित

छाया: रचानाएं आमंत्रित

जिन ख्वाब में तू अब सोती है
वहा हिस्स--लताफ़त रोती है
वो आयेगा अब तबरीज ना कर
ये तल्ख मुबाहिस दीद का कर
मिट जायेगी राते अब काली
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
जब चाँद ज़रा माध्यम निकले
रात की स्याही रीत गई
आदाब मोहब्बत जीत गई
असुवन आँखे अब पोंछ ज़रा
अज़मत एहबाब ना नींद भरा
तू देख उठा कर सरमाया
इन मधुमासी रातो में
चहू और उजाला फैलेगा
जब चाँद तेरा धीरे निकले
बस चाँद ज़रा माध्यम नीकले .....GURU KAVI HAKIM.......

Thursday, October 16, 2008

कण-कण लौ जगी उससे
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की
मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की
मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
पदचाप जवानी की
बंधी डोर जिससे जिंदगानी की ......
व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की
बंधी डोर जिससे
जिंदगानी की.................GURU KAVI HAKIM................

Tuesday, October 14, 2008

पथ पेम

पथ प्रेम ये सीध सामान बना ,
छूटे भय-शंसय और खोट नहीं

चित चंचल मन व्याकुल बाते ,

नि:संशय ह्रदय कोई चोट नहीं

जीवन लतिका सुर मधुर मुक्त ,

ये गतिमय स्त्रोत झंझात नहीं

कुछ शेष रहा शैशव यौवन दर्पण,

ये अवशेष चांदनी रात नहीं

अधिराए बदरीया काली क्यू ,

ये मनुजोचित प्रीत सी बात नहीं

हृदय में ये छल क्यों पनपे ,

कहता पल पल सुधि साथ नहीं

तुम नित नित रचना रचती हों ,

यहाँ प्राणों का आघात नहीं

तुम सब कुछ छीन चली पाती ,

हृदय में खुशी की बात नहीं



गुरु कवि हकीम
पथ प्रेम सजा तू अब राधा ,
माधव तबहू नाही कातर हिरदे ,प्रेम बढ़त होय विरह आधा ।
अब कै तार तिये सूत नोका , सूनुह प्रात भावः विहल साधा
तोरी रटु बिछिया सी बतीया ,लीये जिए नछत्र सा अनुराधा
इबिही प्रेम पथि तोई विधिना राखो ,जोई चुनर सुई हुई बाधा
अपवश नयन ना चितोर भरउ अबू ,करी सूनी बात सुनो माधा
दियौ अभेद "हकीम" गती दाउँ ,समरथ सुमिरन जो बलि राधा ......
जानत मर्म दुहूँ तहों बीचु राखिबै ,
कौ जानू कबहू बिसरायो जई ॥

जणू सूनी भाव "हकीम" जू मीडै ,

मनोरथ चटाक बिखरायो जई ........


गुरु कवि हकीम ..........

Saturday, October 11, 2008

ये अँधेरा घना
नग तम् से बड़ा
उसका सीना तना
लौ डरने लगी
हौसला ना छिना
कर के हिम्मत कों वो
बढ़ के यु खिल गई
अँधेरा भी गया
नग की नींव हिल गई
नतमस्तक पहाड़
अँधेरे की दहाड़
कंदन से काह
सारी तिम छिल गई

कंदन =पत्थर फोड़ना
काह= अन्धकार से बाहर निकलना
इज़हार करू तो कैसे करू ...
दिल नीस्त रहा मुतजात बना

इज़हार करू तो कैसे करू
चीस्त मेरा तिहीदस्त रहा
मैं इशक करू तो कैसे करू
एक जहा ढूंडा गरचे हमने
वहा पर भी पर्दा नाशाद्काम
वो सात तहों के भीतर था
मैं आबादस्त था बिना जाम
लबरेज झलकते जामो का
इशआर करू तो कैसे करू ......
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू
एक शाम इम्तिदादे कैफ लीये
जामे तरतीब पीये हमने
बादये कुहन के शीशो में
शब -ऐ-पैगाम जिए हमने
हर शाम तुलुअ की तारीकी
तन्हाइयो में रोया करते
बियाबान गुजरते पहलू में
महदूद करू तो कैसे करू
दिल नीस्त रहा मुतजात बना
इज़हार करू तो कैसे करू ..........guru kavi hakim.....

संसार जगत एक अंध कूप ......

संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप
उस पार समंदर पर्वत है
इस पार नदी का खुला रूप
इंसा बटता खुशिया रोती
और भूख में है भाषा सोती
जहा मौत नाचती दौराहे
ले हाथो में पत्थर स्वरुप
संसार जगत एक अंध कूप
संसार जगत एक खिली धूप .....
ये लोक गतानुगति का है
सबकी विस्मृत सहमति का है
अलसित जीवन की धारा पर
यहाँ टूट रहे शिथिल कुरूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप ......
संसार सोच एक दर्पण है
प्राणों के भीतर अर्पण है
करुणा पिसती अंधियारे है
अवसादों के आँगन सारे है
यहाँ रोज़ सुलगती साँसों में
जीवन रचता अनुप्रीत अनूप
संसार जगत एक अंध कूप
जहा खिली छिपी रहती है धूप .....guru kavi hakim

Monday, October 6, 2008

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
सोई साँसे संगीत हुई
मन ठहर गया
मन हिहर गया
सपनों सी मेरी जीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
ठहर ठहर मैं इतराता
समय पकड़ कर कर झुठलाता
जग दोष मेरा बेमोल हुआ
शब्दों में वो अनमोल हुआ
सपने जागे
मेरा मन भागे
रोती साँसे भी गीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
जीवन की धारा हसरत थी
रुकने की कीसको फुरसत थी
मुट्ठी भर सपने पाने कों
चुटकी भर जीवन जीने कों
अलसाई इन पलकों में
उलटी धारा भी रीत
हुई प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा
किरणों में अंकीत सी रेखा
पथ परिचित में आगे बढ़ता
तारो के बादल में चढ़ता
मन आलोक गगन कों छूकर
अभिलाषा के अंत के ऊपर
पल-भर परिचित मनमीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

Saturday, October 4, 2008

इंसान बिके एक धेले में

मेरा साहब कहे अकेले में
निरमोही जगत झमेले में
आखन देखी झूट लगे
जागत रहियो इस मेले में
समझावत हारा मन मोरा
ये रंग बिरंगी सा डोरा
मैं ढूंदत ढूंदत ढूंड फिरा
मैं बिचल गया इस रेले में
रे सुन "हकीम" बाती तेरी
मैं रोऊ आज अकेले में
निरमोही जगत झमेले में
इंसान बिके एक धेले में
ये चेतन मन जब कहता है
अकलुष सपनों सा बहता है
जब विश्व-वेदना बढ़ती है
निष्ठुर व्यथा तब चढ़ती है
इस विश्व-वेदना के भीतर
अकुलाऊ आज अकेले में
पाप पुन्य जहा गले मीले
और रहते एक ही थेले मैं
मेरा साहब कहे अकेले में
इंसान बिके एक धेले में
निर्मोही जगत झमेले में

तेरे प्यार मैं........

मन बांधे ,बंधू मैं

तेरे प्यार में ,

सपने पुलकित हरीतिमा ,

तेरे प्यार में

पथ पथ पे बिखरा

सुनहरा सा रूप ,

मधु मरन्द भर कर

खिली जैसी धूप .

सिर्फ एक शब्द है ,

विरहाकुल सी हद है .

विषय वश हुआ मैं ,

अधर चूम कर ,

कुमुद दल पे भंवरे

सकल घूम कर ,

मन के सीते है धाँगे

तेरे प्यार में

मन बांधे ,बंधू मैं

तेरे प्यार में .......

ये द्रवित प्राणों का

भय अब नहीं

ह्रदय के भीतर

भ्रम अब नहीं

साँसे बिखरी थी

जो मेरे कल

आलिंगन करती है

वो पल पल,

छूकर जीवन की

मुरली की धुन

सजल- स्वर्ण

सपने बुने प्रतिपल,

मैं रीते ह्रदय का

बनू मुक्त बंधन

तेरे प्यार में .....

मन बांधे ,बंधू मैं

तेरे प्यार में ......... Guru Kavi Hakim.......