Sunday, August 3, 2008

बच्चे बेचारे










जिन्हें देखकर तुम, सजाते दीवारे ।


ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे ॥

ये आंसू की धारा , ना बाती ना तैल।

ये रीते चीरागों की, खुरचन का मैल॥

ये गम की है साँसे, जमीदोज आसे

बडो से अक्लमंद, ये बच्चे ज़रा से ।

आँखों का मंजर , बुझी आग जैसे ,

ये खाली से चूल्हे ,जले आग कैसे,

समंदर में मिलते, बने झाग जैसे ,

बने तन पे नासूर,से दाग जैसे ,,

ये नूर-ऐ-अमावश, अँधेरा ये काला ।

जिन्हें ढूँढता ही ,नही है उजाला ,,

ये आंसू शर्म के , गरीबी ने फेंके ॥

जिन्हें नाज हिंद पे, कहा वे भी देखे

ये भारत के बेटे ,और माँ के दुलारे ॥

ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे,

"हकीम" की आँखों के, है ये सितारे

जिन्हें देखकर तुम , सजाते दीवारे ,

ये आशा से धूमिल है, बच्चे बेचारे

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