
जिन्हें देखकर तुम, सजाते दीवारे ।
ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे ॥
ये आंसू की धारा , ना बाती ना तैल।
ये रीते चीरागों की, खुरचन का मैल॥
ये गम की है साँसे, जमीदोज आसे
बडो से अक्लमंद, ये बच्चे ज़रा से ।
आँखों का मंजर , बुझी आग जैसे ,
ये खाली से चूल्हे ,जले आग कैसे,
समंदर में मिलते, बने झाग जैसे ,
बने तन पे नासूर,से दाग जैसे ,,
ये नूर-ऐ-अमावश, अँधेरा ये काला ।
जिन्हें ढूँढता ही ,नही है उजाला ,,
ये आंसू शर्म के , गरीबी ने फेंके ॥
जिन्हें नाज हिंद पे, कहा वे भी देखे
ये भारत के बेटे ,और माँ के दुलारे ॥
ये आशा से धूमिल, है बच्चे बेचारे,
"हकीम" की आँखों के, है ये सितारे
जिन्हें देखकर तुम , सजाते दीवारे ,
ये आशा से धूमिल है, बच्चे बेचारे
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