Saturday, September 13, 2008

प्रबल वेग की धारा सा
मन संताप बढ़ा मन में
मानवता के इस क्रंदन पर
शापित आक्रोश जगा जन में
काली अंधियारी रातो का द्वेष
उर उजियारे में फैलाता क्‍लेश
नफ़रत का ये घौर अँधेरा
ना तेरा है ना ही मेरा
कब जागे बुद्धा की बाते
ह्रदय बीच उनके कण कण में ......
मौत बाटते काले बादल
मृत्‍यु नाच आँगन में वसुधा के करते
पावन अमृत में अनीति का विषपान है भरते
फूँक रहे पेडो की धरती
आग बुझेगी कब ये वन में .......
कौन बचेगा ज्वाल लहर से
कौन जियेगा व्यथा जहर से
जिन पत्तो से आँगन रचते
कौन बिंधेगा रूद्र कहर से
व्याकुल हूँ इस छल पीडा से
व्याकुल हूँ इस मिथ्या से
उमड़-उमड़ कर सपने छलते
स्पन्दन करते उन्मन में.......

----------कवि हकीम ------------

सड़क के खाली पन्ने.....


सड़क के खाली पन्ने

दूर तक

निगाहों का का सफर

और विचरण करते हुए

हमसायो के बीच

आस्तित्व की रक्षा को

आतुर इंसानी सोच

बहुत बीच के फासलों से

गुजरता हुआ

फिर आ जाता है

परिधी के

चक्कर सा काटता

उसी बिन्दु पर

जहा से आरम्भ

हुआ था

सोच का सफर

शुन्य की खोज में

रीते हुए

खाली पन्नो पर...

Friday, September 12, 2008

इस उजले पथियारे पथ से
बीच धरा के मृदुल रथ से
मुझे जन्म दो माँ
बाट सकू पथ पीडा मन की
विद्युत-छबि उर नवजीवन की
तिमिर भेद प्रकाश उबेरू
उन्‍मन पुष्‍प गति बखेरू
ज्योति ज्योति नव प्राण खीच कर
हर जीवन में अमृत सींच कर
नभ हाथो से तारे छुलू
मुझे जन्म दो माँ
रोक सकू अंधियारा सब का
बाँध सकू उर उजियारा सब का
नहीं त्रास नहीं प्यास बचे अब
क्षुब्ध, लुब्ध तूफ़ान सजे अब
रचो रक्ष शुक्ति मरूपथ से
अंत ना हों दुर्लभ परिपथ से
मुझे जन्म दो माँ
जन्म दो माँ

Monday, September 8, 2008

नुकताची बढ़ती गई, दिल के तारे ना जले
अब जमाने में भला ,खुद-ब-खुद कर्ब चले

कमरी रातो का समा ,दिल का दस्तगीर बने
फिर वो मावस की सबा, नग्जे हरबार खिले

मैं फकत ताइब तेरा ,जाब्ते गम मैंने कीये
बुगज बढाता ही गया ,ना मिटे दिल के सिले

ये अजीयत सा शमा, तजल्जुल करता सहर
गमख्वारी ना मिली , फिर होके ग़मगीन चले ...


कर्ब = व्याकुलता /पीडा
कमरी = चांदनी
दस्तगीर = मददगार
मावस = काली अंधेरी रात
सबा = वक्त
नग्जे = अदभुत हालत
ताइब = बुरी आदत पर अलग रहने की प्रतिग्या करने वाला
जाब्ते गम = दुखो उजागर ना करने वाला
बुगज = मन में रखे जाने वाला बैर
अजीयत = यातना ,दुःख
तजल्जुल = कम्पन
सहर= सवेरा
गमख्वारी= सहायता
ग़मगीन= दुखो से व्याकुल

.............हकीम साहिब .......

Wednesday, September 3, 2008

शब्द

यहाँ व्याकुल से
शब्द खड़े है
परिधानों में
शब्द जड़े है
मेरे इन शब्दों में
तुम हों
मेरी इन आँखों में
तुम हों
जीन शब्दों से
साँसे पिघले
मेरी उन साँसों में
तुम हों
अपने शब्द ,
मै गाऊ कैसे
तार है टुटे
मन के ऐसे
एक नही दस
ओर खडे है
कीसको मारु
पास बढे है
गलत बने सब
गोरख धन्दे
गान्ठ के पुरे
आन्ख के अन्धे
यहा ........
बढता ही जाये सन्ग्राम .........
कसम से हम....
रह जाते है दिल थाम ..

Tuesday, September 2, 2008

ये मंजर ....


ये मंजर दिल जलाता है इन्तेबा है बहुत बाकी
अभी से हाल बर्गे -ऐ- दिल, अभी मंजिल बहुत बाकी ॥


बताते हों जो हिचकियों से हमारा राज राह दहरे
सितम सीने में गाफिल है ,अभी बाते बहुत बाकी

तवक्को तुम नहीं करते , शिकायत आज सारी है
स्याह रातो से तुम डरते , अभी राते बहुत बाकी

सब-ऐ-गम की ये शायारी परेशाँ आज हम भी है
रहो परदों में तुम हज़रत ,हजाते है बहुत बाकी

नही फिकरे गम -ऐ--मंजिल मैं डरता हूँ हिकारत से
वस्ल रख अब हयाते तुम , तिजारत अब नही बाकी ....

Monday, September 1, 2008

हिज्र की पहली शमा दिल में असर करती है
शब समंदर की तरह तेग़-ए-सितम करती है

सहर के दम से आतिश का मजा आता है
सर-ए-महज़र की तरह बर्ग बसर करती है

बट गई साँसे यहाँ तकसीम नजर दिखती है
आने वाली जो बजू सफिरो सा सफ़र करती है

रोज़ आती है सदा पढ़ के किताबो से अता
अफ़सुर्दा बरखो में लिखी बाते असर करती है
अनुनय ह्रदय की मौन हवा
जीवन पथ के निर्ज़न वन में
ज्योत्स्ना का प्राण बिंदु है
जहा देह के देवता
सतत ह्रदय कों अभिलाषा के
पयोनिधिस्वरुप कों विप्लव के साथ
मनस्ताप के
बहुत भीतर तक खोजते रहते है
और हम
क्षुब्ध शब्दों के पास
बैठकर बाते करते है
प्रागंण में सुनतीवो अनजान अनुभूति
हमारी नियमन बातो कों
कान के उस छौर में
संजोह लेती है
और स्वम प्रतिपल सी
ओझल हों जाती है
हमारी स्फुलिग द्रष्टी के सामने से
शब्दों का बहाव
अपने आप में
उस विभिश्ना का प्रतिरूप है
जो हमारे ह्रदय के
अन्त्स्वरूप स्रोतों से
फूटकर बहार आता है
गतिमय प्रवाह और
परवशता की भांती
मैं अकेला बैठा
उस निर्जन चट्टान का
स्वरुप बनने लगता हूँ
जो समय और काल के हाथो
चेतना के
उन क्षण कों जोड़कर
अपने आप कों
खडा कर पाती है
उस जमीं पर
जहा उसका स्वरुप
अपने आस्तित्व कों
निर्मित करता है ......