Monday, October 6, 2008

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
सोई साँसे संगीत हुई
मन ठहर गया
मन हिहर गया
सपनों सी मेरी जीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
ठहर ठहर मैं इतराता
समय पकड़ कर कर झुठलाता
जग दोष मेरा बेमोल हुआ
शब्दों में वो अनमोल हुआ
सपने जागे
मेरा मन भागे
रोती साँसे भी गीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
जीवन की धारा हसरत थी
रुकने की कीसको फुरसत थी
मुट्ठी भर सपने पाने कों
चुटकी भर जीवन जीने कों
अलसाई इन पलकों में
उलटी धारा भी रीत
हुई प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई
रोज़ ढूंड़ता नियती लेखा
किरणों में अंकीत सी रेखा
पथ परिचित में आगे बढ़ता
तारो के बादल में चढ़ता
मन आलोक गगन कों छूकर
अभिलाषा के अंत के ऊपर
पल-भर परिचित मनमीत हुई
प्राणों से बढ़कर प्रीत हुई

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