Sunday, August 24, 2008

कभी गलियों में उनकी जाना हों कहीये उनसे की बेवफा......

एक " हकीम" दिल--मुज़तरिब से राह तकता है तुम्हारी ....


ये तुम्हारी प्यार की बाते मिज़्ह्ग़ाँ जिस के ग़म में पशेमा हों आप

वही आफ़त-ए-दिल-ए-हकीम किसी रोज़ हम भी कहते थे किसी से....



अक्सर मेरे साथ तू रहती है तो तन्हाई क्यू रहती है i
ना जाने कहा ये निगाह-ए-आईना-साज़ में छुपी रहती है

मिया हम शेर है औए शेरो की गुर्राहट नहीं जाती
निगाहें भर भी उठी तो खाकसार हों जाती है ज़मी॥


ना होठ खिलते है अब ना तब्बसुम है किसी आँख का
शबनम से आंसू है मेरे और खैल दर्दमंदी है ये रात का ...

मेरी रहगुजर में तू ऐसे मिसाले-शरार ना देख ..
जल जायेगा "हकीम" निरे तिनको का बना है ये ..........


अजीयत-ऐ-जहा की अजार सी जमीं का रहनशी दयार है तू ..
चिरागों कों जलाए रखना अंधेरो में कम ही नजर आता हूँ मैं...




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