Monday, July 28, 2008

चाह

घनी काली स्याह 
पगडन्डी पर 
उजली नीगाहो के 
बीच मे,
आती हुई 
वे अलसाई तस्वीरे
मन के कीसी कोने मे 
दूर तक 
पीडा की अनुभूति
छोड ही जाती है ..
स्याह सफेद पन्नो पर
ओर वक्त के 
स्तनो पर
खून की परते
वर्सो से जमा 
हो रही है
खून के सर से 
आदमी बार बार 
मुह फाडता है 
मस्तिष्क का 
अन्छुआ द्वार
जहा ग्यान व प्रकाश का 
प्रवेश निषेध हे 
अज ये चौराहे पर 
नीलामी मे बिकता है 
सलवट धारी 
बीस्तर पर सीकता है
गहरी घाटी के 
अथाह अन्धकार मे 
टुटी हुई वो 
पत्थर सी तस्वीरे
भविष्य के गर्त मे 
भागती चली जाती है 
केवल ओर केवल 
जीने भर की 
चाह के लीये...

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