Wednesday, October 22, 2008

मन डोर............

कण-कण लौ जगी उससे
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

मधु-कोष अक्षय सा गाये
ह्रदय जोश विकल उर आये
पगध्वनी तारकमय जगती
सुरवाणी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

मरु-प्यास की ध्वनी कम्पित
चित्रित नयन आनन पुलकित
पछुवा बन इतराऊ
नायिका बन जाऊ
कहानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

स्निग्ध सुधि सजे हर कोना
मैं बिछाउंगी फूल-बिछौना
मन दर्पण चंद्रमा झांके
मैं नाचूंगी शोर मचाके
सुरमय सपने सजाती
चुपके से पदचाप
जवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....

व्यथित है अश्रु दीप धारा
जान ले जो वो जीवन सारा
मिट जाए ह्रदय अंधियारा
प्रश्नमय बन बाती जली है
रीत की प्रीत छली है
श्रृंगार-सदन में आँखे गीली
दीवानी की ......
ये मन डोर बंधी जिससे
जिंदगानी की .....................





गुरु कवि हाकीम.........................


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