Thursday, August 28, 2008

मैं यूही शौक से हार जाता हूँ बाजी तुझसे ॥
ताकी तुम हँसते रहो मेरे प्यार की खातिर ॥
मैं कजा कों भी हरा दुंगा अपनी हसरत से
ताकी तुम जिंदा रहो मेरे प्यार की खातिर
इश्क जाहीली में पशेमान है ये जुलो सितम
ताकी शर्मिन्दा ना हों मेरे प्यार की खातिर
कितनी फुरसत से जोड़ी ये तकसीम-ऐ-शाई
फासले दरमयां ना हों मेरे प्यार की खातिर
ऐ ग़म-ए-दुनिया तेरे गम का तस्व्वुर हूँ मैं
तू गमजदा ना रहो मेरे प्यार की खातिर
होठ ताकीद है और बेच दी गैरत "हकीम"
ताकी बंदगानी ना हों मेरे प्यार की खातिर ......

1 comment:

Anonymous said...

Nice Dear,
amaz Poem.....
Regards ....
Kumardev