Monday, September 1, 2008

अनुनय ह्रदय की मौन हवा
जीवन पथ के निर्ज़न वन में
ज्योत्स्ना का प्राण बिंदु है
जहा देह के देवता
सतत ह्रदय कों अभिलाषा के
पयोनिधिस्वरुप कों विप्लव के साथ
मनस्ताप के
बहुत भीतर तक खोजते रहते है
और हम
क्षुब्ध शब्दों के पास
बैठकर बाते करते है
प्रागंण में सुनतीवो अनजान अनुभूति
हमारी नियमन बातो कों
कान के उस छौर में
संजोह लेती है
और स्वम प्रतिपल सी
ओझल हों जाती है
हमारी स्फुलिग द्रष्टी के सामने से
शब्दों का बहाव
अपने आप में
उस विभिश्ना का प्रतिरूप है
जो हमारे ह्रदय के
अन्त्स्वरूप स्रोतों से
फूटकर बहार आता है
गतिमय प्रवाह और
परवशता की भांती
मैं अकेला बैठा
उस निर्जन चट्टान का
स्वरुप बनने लगता हूँ
जो समय और काल के हाथो
चेतना के
उन क्षण कों जोड़कर
अपने आप कों
खडा कर पाती है
उस जमीं पर
जहा उसका स्वरुप
अपने आस्तित्व कों
निर्मित करता है ......

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