आ चल चल के कही दूर चले
मन रीता है मजबूर चले
ये सकल पथ सब घूम चले
आ चल चल के कही दूर चले......
ये शक्त शिराएँ व्याकुल है
व्यथित है ह्रदय के बंधन
इन भाव विभोर नयनो में
नैसर्गिकता के है ये छंदन
ये दूर भागते पथ आँगन
दल नभ नयनो में घूर चले
आ चल चल के कही दूर चले ......
तप रे मन सजल-स्वर्ण से पावन
मूर्तिमान सपनों में रे ले चल मन
ढल रे, ढल आतुर मन
मन पंडित जाने ना जाने मन
अतिशय सुख के दस्तूर चले
आ चल चल के कही दूर चले ........
.......गुरु कवि हकीम........
Tuesday, November 25, 2008
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