Friday, October 17, 2008

युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये

युही हर जख्मो के आइने में चेहरा ना दिखाइये

फकत हर जख्मो कों चहरे का आईना ना कहो
कहानी मेरी दर्द-ए-मोहब्बत की दास्ताँ ना कहो

कफस की स्याही रोकती है हवा-ए-शौक़ की कुव्वत
महसूस होती जिन्दगी कों खालिस रोशनाई ना कहो

दोस्त के हाथो ने उठा रखी है आज दुश्मन की तलवार
हमने तो गले लगाया है जयचंदों कों उसे गद्दार ना कहो

निगाह-ए-जमाल में हमारे ऐबो कों गिनाओ जमाने भर में
मगर हमारी अक्स-ए-सोज़-ए-दिल के सामने बुरा ना कहो

मिज़ाज-ए-आजिजी ना दे सको तो कोई बात नहीं "हकीम"
इन नकली चेहरों के आइनों में माहौल अह्द-ए- वफ़ा ना कहो ..

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