Tuesday, October 21, 2008

दो पैसो में इंसान बिके ....

सैय्याद की दौलत बिखरी है
इस दौलत में हर शान बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....
ईमान बिके बे-ईमान बिके
यहाँ देश धर्म की शान बिके
उजले बिकते काले बिकते
मंदीर बिकते मस्जिद बिकते
पुरपेंच जमाने में सारे
रहबर के सब भगवान् बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके .....
धन बल की माया जारी है
बिकती हुई तन से नारी है
अधखिली ज़र्द सी कलियों में
सौदायो की भारमारी है
नीलामघरो के जीनो में
माँ बहनों की यहाँ आन बिके
नीलाम कारवां के भीतर
दो पैसो में इंसान बिके ....... ......guru kavi kahim......

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