Monday, June 16, 2008

मैं चमार हू..मैं पैर हू


मैं चमार हू..मैं पैर हू


जी मैं चमार हू
क्यों की मैं
महनत करता हू
भीख नहीं माँगता हू
कीसी को धोका
नहीं देता हू
कीसी की
रोटी नहीं छीनता हू
दुनीया में डर के रहता हू
सारे जुल्म सहता हू
और जो सारे जुल्म करते है
देश को प्यारे है
देश के दुलारे है
धोखा उनकी फीत्रत में है
फरेब उनकी कुदरत में है
पर वे महान है
क्यों वे चमार नहीं
मैं महान ँ होकर भी हीन ह
देश में लाचार हू
क्यों की मैं चमार हू
मेरी कवीता कौन पढेगा
देख के उनको मौन बढेगा
ठेका उनका भाषा पर
ठेकेदार है कवीता के
शब्द उन्हें मेरे लगते बेकार
जी मैं जो हू चमार

तुन्ही ने कहा
की मैं पैर हू
मैंने नहीं
चलो मान लेता हू
मैं पैर हू
ये मत भूल
मैं पैर हू
पर जीस दीन मैं
टूट जाऊँगा
धडाम गीरेगी
देह तुम्हारी
ये मत भूल
मैं पैर हू
ये मत भूल
मैं पैर हू
सदीया बीती
ढोता आया
ना जाने
कब से
रोता आया
अब भी संभल जा
नहीं तो जाल ले
जीस दीन मैं
टूट जाऊँगा
धडाम गीरेगी
देह तुम्हारी
ये मत भूल
मैं पैर हू
ये मत भूल
मैं पैर हू
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2 comments:

Dr SK Mittal said...

जनाब की लेखनी क्या बहता दरिया है
जो इस में डुबकी लगा ले उसका मुकद्दर बढ़िया है

मैं रोज स्नान करता हूँ प्रभु ध्यान करता हूँ
इस दरिया से आचमन कर आपको नमस्कार करता हूँ

हकीम जी said...

वजूद है तेरा इस तरह , जो छुयेगा आसमानों को .
नज्म के खामोशी ने कहा, तेरे दील के अरमानों को ..