
तेरी आँखे
आँखों से चले इन तीरों में, बचने की कहा गुन्जाईस है .
जब ये सब कुछ यहाँ लूट चली, अब मेरी कहा फरमाईस है ..
ये बोलती आँखे कहती है, जैसे नदीया पर्वत बहती है ...
लेकीन इन बोलती आँखों में, मेरे मन की कहा ये ख्वाईस है ....
यु पीते पीलाते है हम भी, मयखानों के उन आँगन में ....
लेकीन जो नशा इन आँखों में, बोतल में कहा गुन्जाईस है ......
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