मेरी हार
टूटी पतवार है
नाव बेकार है
पानी चढ़ने लगा
नदी भारी हुई
डूबने की सभी
तैयारी हुई
तेरी ये दूरीया
मेरी मज्बूरीया
बढ़ता ये फासला
टूटा यू होसला
मरने की तभी
यू खुमारी हुई ...डूबने की ..
मैं पशेमान सा
यू परेशान था
याद खुद को करू
या खुदा को करू
बड़ी मुश्कील से ये
बेकरारी सही .....डूबने की सभी
सोचु मैं यू भला
आई क्यू ये बला
सर फटने लगा
मन बटने लगा
फीर भी पहल ना
मन में तुम्हारी हुई ........डूबने की ...
आश अटके वहा
मन भटके यहाँ
नैन बैचेन है
दील को ना चैन है
जग हँसाई कसम से
हमारी हुई ............. डूबने ...
टूटे मन को लीये
मैंने आंसू पीये
तब ये ली थी कसम
ख़त्म सारी रषम
फीर भी मन से ना
तेरी इंतेजारी गई ........डूबने की सभी
1 comment:
फीर भी मन से ना
तेरी इंतेजारी गई ........डूबने की सभी
sahi me sir bahut hi gajabki hai
is kavita me beh jaate hain
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