Monday, June 16, 2008

मेरी हार


मेरी हार



टूटी पतवार है

नाव बेकार है

पानी चढ़ने लगा

नदी भारी हुई

डूबने की सभी

तैयारी हुई

तेरी ये दूरीया

मेरी मज्बूरीया

बढ़ता ये फासला

टूटा यू होसला

मरने की तभी

यू खुमारी हुई ...डूबने की ..

मैं पशेमान सा

यू परेशान था

याद खुद को करू

या खुदा को करू

बड़ी मुश्कील से ये

बेकरारी सही .....डूबने की सभी

सोचु मैं यू भला

आई क्यू ये बला

सर फटने लगा

मन बटने लगा

फीर भी पहल ना

मन में तुम्हारी हुई ........डूबने की ...

आश अटके वहा

मन भटके यहाँ

नैन बैचेन है

दील को ना चैन है

जग हँसाई कसम से

हमारी हुई ............. डूबने ...

टूटे मन को लीये

मैंने आंसू पीये

तब ये ली थी कसम

ख़त्म सारी रषम

फीर भी मन से ना

तेरी इंतेजारी गई .......
.डूबने की सभी

1 comment:

manas bharadwaj said...

फीर भी मन से ना

तेरी इंतेजारी गई ........डूबने की सभी

sahi me sir bahut hi gajabki hai

is kavita me beh jaate hain