Thursday, June 26, 2008

पगडंडी पर चलते चलत

....नर नीराशा का मेल ना कोई.......जीवन जैसा खेल ना कोई...



थक कर बैठ गया था जब मैं
पगडंडी पर चलते चलते
मन कों हार गया था जब मैं
अग्नीकंडी पर जलते जलते
मन व्याकुल था,
धुप कड़ी थी
पथ छाया भी
दूर खडी थी
संगी साथी
साथ ना कोई
जीसे थाम लू
हाथ ना कोई
पथ जीवन सब
छुट गया था
भाग्य मुझसे
रूठ गया था
मन सूरज सा हार गया जब
े दूर छीतीज़ ़ पर ढलते ढलते .....
फीर भी मैंने
आश ना छौडी
मन नीराशा में
सांस ना मौड़ी
नहीं मिलेगा
जीवन ऐसा
मानव रूप में
पाया जैसा
यत्न कीया
फीर मन धीक्कारा
पागल पंछी
क्यों मन ू हारा
व्यथा आई
बात सही है
पर देख कीरण
अब दूर नहीं है
मील जायेगी मंजील तेरी
पगडंडी पर चलते चलते .......( रमेश राज आनंद उर्फ़ गुरु कवी हकीम हरी हरण हथोडा ..."जंग लगे पत्थर"..1994)

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