
सच की अनुभूती
झर झर झर झर झरने बहते
कल कल करती नदिया
हम आपस में लड़ते रहते
बीत गई है सदीया .........................
पर्वत कहता जंगल कहता
कहता पानी बहता
आपस की खीचा तानी में
इंसा नहीं है बढीया......................
इस इंसा की भोली शकले
बाते लम्बी चोडी
झाँकू पर जब इसके दील में
ये शैतान की पुडीया................
ये दीन हीन से घरणा करता
दान धरम को आफत
बदले की ये आग में जलता
बुनता नफरत की लडीयाँ .................
गयान कीताबी पाकर सोचे
मैं बन गया हूँ ग्यानी
पर इसा मुस्सा बुद्धा नानक
है इनका कोई सानी
लक्ष हमारा इस दुनीया में
ख़त्म हों दुःख की कडीयाँ .................
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