एक बूँद स्वाती अक्षर सीएक बूँद स्वाती अक्षर सी
मेरे प्राणों की पहचान बनी
निज जलती बुझती पलकों में
सुरमई उज्जवल मुस्कान बनी .......एक बूँद स्वाती अक्षर सी
संगीत स्वाती धारा सा
सौरभ पंखो पर बैठ के मैं
दृग-जल पीने को आतुर था
चंचल सपने सी आन तनी ..............एक बूँद स्वाती अक्सर सी
यहाँ बिखरे बिखरे कुंजो पे
मोती के चुम्बन खूब सजे
चंचल मन की आतुरता में
ये विदधुत सी पहचान बनी .........एक बूँद स्वाती अक्सर सी
पावन नीरज अर्चित चन्दन
सुर्भीत सा खीलता गौरव मन
लो की अंचल में जल जल कर
तबही मोती सी शान बनी ..............एक बूँद स्वाती अक्सर सी
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