ये बढ़ते कदम क्यों थम से गए ,
क्या सोज़-ऐ-वफ़ा एतबार नहीं ..
तू देख हकीमी का जीग्रा ,
एक बार नहीं सौ बार सही.......................
हम सुने दील कों पढ़ते है,
और साज-ऐ-मोहब्बत गढ़ते है ,
इन सुर्ख गुलाबो की खातीर
यु फलक-ऐ-फकत हर बार युही ..............
यु हसने हसाने की खातीर ,
पैगाम-ऐ-मोहब्बत भेजा है .
रोने के लीये सारा जग है
हसने के लीये कोई यार नहीं......................
हम देख के हैरां है तुझको,
जब देख के तुम शर्माते हों,
सौ बार धड़कते सीने का
क्या तुमको अभी एतबार नहीं................
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment