मेरे सुने दील कों आश है
जो सदा सी मेरे पास है
मेरे दील की धडकनों कों अब
उसी रहगुजर की तलाश है .........................
यु तकता रहा आँखे थकी
एक आश पुरी ना हों सकी
यु तो राह-ऐ-मंजील मील गयी
पर दील में एक खलाश है ......................
फलक पे आँख खोजती
जो दील मेरे रोज़ थी
मैं चमन चमन खंगालता
वो कली जो एक ख़ास है ............................
मेरा दील अजीब जान है
मेरी खो गई पहचान है
तकदीर ने वो छीन ली
मुश्ते गुबार की जो बास है ............................
हर मुकाम से गुजर गए
ये ख्वाब जाने कीधर गए
मैं उन्ही लम्हों की तलाश में
जो दीलो की दर्दे प्यास है ......................
ऐ "हकीम" बाती बुझ गई
लौ भी ये समझ गई
वो सुहानी सुबह जा चुकी
अब कीस रहगुजर की आश है ..........
(साभार ..जंग लगे पत्थर ..रचनाकार ..रमेश राज आनंद उर्फ़ कवी हकीम हरी हरण हथोडा ..१९९४)
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