Monday, June 16, 2008




दम तोड़ती मान्‍यताएं ..... .......

चूल्हे से
कभी जो धुआ
निकलता था ,
आज वो आकाश
पर नहीं
धरती के बीच से
होता हुआ
पाताल में
चला जाता है .
पोपले मुंह से कभी
निकलता वो भारत,
थिरकने के लिये
आज पाव ढूँढता है .
पलकों का आँचल
जो घूंघट के नीचे
सरकता था,
आज , अपनी ही जमी पर
अपनी साख ढूँढता है .
टूटे हुए जिश्म में
तरक्की का पैबंद
लगाकर घूमता है
चश्मे के नीचे
रंगीन कांच में
आँख की रोशनी
आँखों को रोशन नहीं
रोगन कर रही है
पीत चेहरे पर
खोखली हंसी के साथ
मंदीर में राम को
क्‍लबों में जाम को
तीर्थो में भगवान् को
ढूँढता फिरता है
मस्तिष्क का ज्वार
और विचारों की आंधी
जहां हर्दे की
धारा को
सागर की जगह
वापस
पर्वतों में मोड्ती है
वहीं पर मान्‍यताएं
दम तोड़ती हैं .

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