Thursday, August 21, 2008

वो रूसियाही आज इन फीजाओ मे

ऐसी हवाओं की बात फिर क्यू है



कल चीरागो मे तैल हमने भरा

अब ये काली सी रात फिर क्यू है



नींद पर आज लहु के छींटे

मुबागाचो मे साथ फिर क्यू है



तु तसल्ली मे सबसे पुछा फीरा

मेरे हाथ मे हाथ
फिर क्यू है



कल किसी बात पर मोहल्ला फूंका

आज मेरे घर ये जमात फिर क्यू है



वो मरा ईक "हकीम" हमले मे

उसके हर्फो मे बात फिर क्यू है..

1 comment:

समय चक्र said...

bahut badhiya rachana . dhanyawaad.