Friday, August 29, 2008

सूरज निकला आँखे मलते ..

सूरज निकला आँखे मलते
अंधियारे से चलते चलते
राह देख रही है सुबह
मन तृष्णा में जलते जलते
स्वपनिल आशा किरण पसेरी
सींचे मन में सब उजयेरी
हर्षित मन जब पाव पसारे
धूप चखु अपने हीस्से की
अंधियारा मन ढलते ढलते ....
आँखे भीगी मन मुस्काये
हँसते हँसते पलके गाये
समझ ना पाऊ जब भाषा में
खामौशी मुझे राह दिखाए
दूर छितिज पर हंसते तारे
ह्रदय वास पर जलते जलते .......

1 comment:

रश्मि प्रभा... said...

समझ ना पाऊ जब भाषा में
खामौशी मुझे राह दिखाए .......
khubsurat ehsaas