Thursday, July 24, 2008




 

वो हसे इस भरी दुपहरी मे 
वल्ला कुछ है जो दील खुमारी है 

कोई हसता यू नही आन्खो से
अल्ला कुछ बात से शियारी है

सुर्ख कपडो से ना कमतर कुन्दन
यु तो भादो की धूप सारी है 

वो गजल बन के चल पडे कब से 
रूह खामोश सी हमारी है 

ये सफेदी जो दीख रही सर पर
कुछ तो ये धूप की ही मारी है 

कुछ तो हम आज हकीमी से गिरे 
कुछ 
"हथौडा" भी हम पे भारी

1 comment:

शेरघाटी said...

हिंदी वर्तनी में ब्लॉग पर भी काफी अशुद्धियाँ हैं उन्हें दुरुस्त ज़रूर करें. यूँ तो ब्लॉग या ऑरकुट में दिक्क़त ज़रूर होती है लेकिन कम चल ही जाता है.
शीर्षक में ही गलती है . शब्द शिकायत है शिकायत नहीं.

इन अशुद्धियों के कारण काव्य का मज़ा बेकार हो जाता है .
बड़े भाई बुरा न मानेंगे आशा है.