वो हसे इस भरी दुपहरी मे
वल्ला कुछ है जो दील खुमारी है
कोई हसता यू नही आन्खो से
अल्ला कुछ बात से शियारी है
अल्ला कुछ बात से शियारी है
सुर्ख कपडो से ना कमतर कुन्दन
यु तो भादो की धूप सारी है
वो गजल बन के चल पडे कब से
रूह खामोश सी हमारी है
ये सफेदी जो दीख रही सर पर
कुछ तो ये धूप की ही मारी है
कुछ तो ये धूप की ही मारी है
कुछ तो हम आज हकीमी से गिरे
कुछ "हथौडा" भी हम पे भारी
1 comment:
हिंदी वर्तनी में ब्लॉग पर भी काफी अशुद्धियाँ हैं उन्हें दुरुस्त ज़रूर करें. यूँ तो ब्लॉग या ऑरकुट में दिक्क़त ज़रूर होती है लेकिन कम चल ही जाता है.
शीर्षक में ही गलती है . शब्द शिकायत है शिकायत नहीं.
इन अशुद्धियों के कारण काव्य का मज़ा बेकार हो जाता है .
बड़े भाई बुरा न मानेंगे आशा है.
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