बस एक सुराग-ऐ-ख्वाब में मीसल-ऐ-चीराग नूर है .
इब्तीदा -ऐ-इश्क सा सफ़र,नीशान-ऐ इश्क दूर है
हक़ ना मीला है हीज्र में, दर्द मीन्नतकश जरुर है
ये लब खुले "हकीम के ,हकीकत-ऐ-ससब सरुर है .......
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दोस्तों मुझे नहीं पता मेरी कवीता कैसी है ...जैसी भी आपके सामने है .. मगर जैसी भी हों आप मुझे जरूर लीखना या बताना परंतु एक वीनती है सच बताना ... मुझे अपनी आलोचना सुन ना बहुत अच्छा लगता है .. आलोचना से मुझे अपने आप को सुधारने का मौका मीलता है ..मेरे अन्दर नीखार आता है ... आलोचना वोही काम करती है जैसे मेल लगे कपडे पर साबुन....
1 comment:
bahut achha muktak
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