Tuesday, July 1, 2008

कुछ अशीयार

धुँआ धुँआ है जींद्गी रास्ते अजीब से
दूर फीर भी है मेरे बैठा जो करीब से...

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आंसू ना होय कोई ना कोई सीतम की बाते
बेफीर सी हंसी हों जन्नत सा हों आशियाना
मेरे दील के पास बैठे करे गुफ्तगू सुहाना
जीसे खाके ना मरू मैं वो जहर कहा से लाऊ
सुन्दर धरा पे ऐसा वो शहर कहा से लाऊ

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मोह्बात उम्र क्या देखे मोहब्बत दील कों चाहती है
शक्ल दो चार दीन की है मोहब्बत मन कों चाहती है

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