दील का सकु रोता है
बन्द कमरो मे ,
मेरे साथ
बजु सोता है...
कोन कह्ता है मुझे
उसका शवर होता है
बन्द खिड्की मे
मेरे रोज बसर खोता है ...............
ये फीजा और मक्क्नुत-ए-खुदा
याद नही
रोज आती है खबर
रोज जुदा होता है....
मै तब्बवूत मे गीरा
जाहील पे
दील-ए-नादा -ए-हकीमी मे
खुदा रोता है.................hakeem.............
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