Thursday, July 24, 2008

नीन्द आती ही नही

नीन्द आती ही नही 

दील का सकु रोता है 

बन्द कमरो मे ,

मेरे साथ 

बजु सोता है...

कोन कह्ता है मुझे 

उसका शवर होता है 

बन्द खिड्की मे 

मेरे रोज बसर खोता है ...............

ये फीजा और मक्क्नुत-ए-खुदा 

याद नही 

रोज आती है खबर 

रोज जुदा होता है....


मै तब्बवूत मे गीरा 

जाहील पे

दील-ए-नादा -ए-हकीमी मे 

खुदा रोता है.................hakeem.............

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