Friday, July 4, 2008

दुमीया कड़वा नीम

यहाँ क्यों आया रे हकीम
तू क्यों आया रे हकीम
ये दुनीया कड़वा नीम ,
यहाँ दुखो के अंबर भीम,
हुई खुशीयाँ सब तकसीम,
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम
जले दील के दर्द का प्याला
ना तैल ना बाती ज्वाला
तारीक आसमान काला
हुई जुल्म से दुनीया मुकीम
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम.....................
नहीं होता लीबास-ऐ मजाज
यहाँ ढूँढू जबीन-ए-नीयाज
इबीतीदा -ऐ-इश्क है रोता,
छाती पर साँप है सोता.
हर तल्ख़ शह गममीम
भूला सब मैं बस्रीम
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम
उल्टी गंगा यहाँ बहती
हर जुल्म कों दुनीया सहती
ये अजब है दौर कहानी
होसाब की सी जीन्द्गानी
ये फकत-ऐ ककीर-ऐ-ख्वाबे
गई सय्याद से चीड़ीया जीम...
तू क्यों आया रे हकीम
यहाँ क्यों आया रे हकीम.................