Saturday, January 10, 2009

उन करमो की इन्तेजा है दर-हक़ीक़त ज़िन्दगी,

हर सितम की बानिग जहाँ-ए-रंग-ओ-बू बंदगी॥

गर होठो से आयी ना सदा जुलमे उल्फत की,

ग़म-ए-हस्ती में रोया दिल मुस्तकिल 'हकीम'॥

और वस्ल -ऐ-नूर में क़त्ल-ए-हयात जिन्दगी

यू दस्तूर हो गई ,जर्रे ऐ शाह रोशन जिंदगी..................

..............गुरु कवि हकीम ..
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