उन करमो की इन्तेजा है दर-हक़ीक़त ज़िन्दगी,
हर सितम की बानिग जहाँ-ए-रंग-ओ-बू बंदगी॥
गर होठो से आयी ना सदा जुलमे उल्फत की,
ग़म-ए-हस्ती में रोया दिल मुस्तकिल 'हकीम'॥
और वस्ल -ऐ-नूर में क़त्ल-ए-हयात जिन्दगी
यू दस्तूर हो गई ,जर्रे ऐ शाह रोशन जिंदगी..................
..............गुरु कवि हकीम ....
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