Saturday, January 10, 2009

अधखुले साधना के बंधन

पल प्रति पल बने ये रोदन

अवचेतन मन के अंधियारे

निष्ठुर से है ये उजियारे

उन्मय धारा की मोल व्यथा

प्रतिछाया बन वो अमिट कथा

पुरजोर हवा ,प्राणों का मन

चित्त विमुख हुआ ,क्यू ये बंधन

अधखुले साधना के बंधन .......................


तुम ढूँढ रहे शुन्य के पल

मैं ढूँढ रहा उसकी छाया

बेसुध पीड़ा, मन व्याकुल है

ये लोक वेदना की माया

अमरो का एक लोक मिला

घुल जाने की है चाह मुझे

इस पावन मन के भीतर से

क्यू आ रहा मन का क्रंदन

अधखुले साधना के बंधन................



ये नीलम मेघ बसे मन में

और शुन्य सार रचे तन में

पुरजोर हवा ,अवसाद बढे

जलना जिसका अधिकार नहीं

प्राणों का बस वहा शोध बढे

सूखे नयनो की भाषा से

मन महक आई मुझको चन्दन

अधखुले साधना के बंधन.....



आशा की इस मुस्कराहट पर

कम्पन होती हर आहट पर

इन जर्जर तारों के भीतर

मन उलझा है ये क्यू सीतर

प्राणों की क्रीड़ा है शुन्य

मेरे मन की पीडा है शून्य

शून्य के इस आगोश बीच

प्राणों के प्यालो में मधुबन

अधखुले साधना के बंधन..... .......



..............गुरु कवि हकीम........

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