मन के दीपक जलो ,
आशा चंचल सी है.............
तू अकेला जला ,
साथ अक्षय भला
मन के तारो जलो ,
धूप अंचल सी है
मन के दीपक जलो ,
आशा चंचल सी है.....................
हर दिशा प्रकम्पित,
उर में तू ही अंकित
झुलसे परों के प्राण,
व्यथा संचल सी है
मन के दीपक जलो ,
आशा चंचल सी है....................
खोई प्राणों की सुध ,
तन्मय तड़ित् सी क्रुद्ध
बुझे दीपक जलो ,
लौ ये मंचल सी है
मन के दीपक जलो ,
आशा चंचल सी है.....................
अक्षय कोषों में तू ,
मन की साँसों में तू
जलते नभ में जलो ,
प्रीत कंचन सी है
मन के दीपक जलो ,
आशा चंचल सी है..................
स्नेह हित नित रहे ,
क्षण सुरभित उनसे कहे
सिहर सिहर जलो ,
तन में हलचल सी है
मन के दीपक जलो ,
आशा चंचल सी है..................
.........................गुरु कवि हकीम.............
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1 comment:
स्नेह हित नित रहे,
क्षण सुरभित उनसे कहे
सिहर सिहर जलो,
तन में हलचल सी है
मन के दीपक जलो,
आशा चंचल सी है...........
बहुत बढ़िया रचना हकीम जी
समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : वेलेंटाइन, पिंक चडडी, खतरनाक एनीमिया, गीत, गजल, व्यंग्य ,लंगोटान्दोलन आदि का भरपूर समावेश
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