Sunday, January 4, 2009

हे प्रिये ये स्पर्श तुम्हारा ...


हे प्रिये ये स्पर्श तुम्हारा ...
किंचित मन सपनों में भरकर
अभय प्रीति प्राणों में धरकर
पुलकित हृदय अंतरतर गाये
हे प्रिये ये स्पर्श तुम्हारा ...

क्यू आती मन व्यथा पीडा
परिचय परिणय की चित क्रीडा
विवश ना बांधो अंतर्ज्वाला
हृदय सौन्दर्य की मधुशाला
तुम भ्रम संशय आज मिटा दो
मन सन्मुख के सपने भरकर

हे प्रिये ये प्रतीहास तुम्हारा ...



प्रेम सिन्धु जहा सब इतराए
स्‍वर्णिम समुज्‍ज्‍वल स्‍वप्‍न सजाये
मूक निराशा पथ के आगे
क्षीण ज्‍योति मन आगे भागे
भूल गया अवगत की बाते
क्षुधित पिपासा तुच्‍छतर घाते
लील गया निरव उत्‍पीड़न
हे प्रिये ये प्रदोष तुम्हारा ..............

लोटा दो सब सपने मेरे
लोटा दो यादो के दिन पल
अनुभव स्पर्श मृत अभिलाषा
मन में चित्रीत सी वो आशा
नभ से रेशम नील पंखो पर
आँखों की वो सुन्दर भाषा
खिसक गया कंधो से मेरे
हे प्रिये वो हाथ तुम्हारा ........


......गुरु कवि हकीम.....

No comments: