इन आँखों की जवानी में पयामे दर्द भी है
और दहकते ख्वाब भी है किसी मंजर के
गगन की दामिनी का क्या करूँ मैं "हकीम"
बादास्ता सीने में दाग भी है उसके खंजर के ........
........गुरु कवि हकीम॥
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दोस्तों मुझे नहीं पता मेरी कवीता कैसी है ...जैसी भी आपके सामने है .. मगर जैसी भी हों आप मुझे जरूर लीखना या बताना परंतु एक वीनती है सच बताना ... मुझे अपनी आलोचना सुन ना बहुत अच्छा लगता है .. आलोचना से मुझे अपने आप को सुधारने का मौका मीलता है ..मेरे अन्दर नीखार आता है ... आलोचना वोही काम करती है जैसे मेल लगे कपडे पर साबुन....
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